नेपानगर में 1982 से देवी प्रतिमा बना रहे बंगाली कलाकार: ढाई महीने में तैयार हुई 12 फीट की मूर्ति, मुर्शिदाबाद तक से लाई जाती है मिट्टी
मध्य प्रदेश के नेपानगर में दुर्गा पूजा की तैयारियों के बीच बंगाली कलाकारों की वर्षों पुरानी कला और परंपरा एक बार फिर आकर्षण का केंद्र बनी हुई है। यहां एक बंगाली कलाकार परिवार वर्ष 1982 से देवी दुर्गा की प्रतिमाएं तैयार कर रहा है। करीब चार दशक से अधिक समय से जारी इस परंपरा में कलाकार पूरी श्रद्धा, मेहनत और बारीकी के साथ मां दुर्गा की प्रतिमा का निर्माण करते हैं। इस बार भी करीब ढाई महीने की मेहनत के बाद 12 फीट ऊंची देवी प्रतिमा तैयार की गई है।
ढाई महीने की मेहनत से तैयार हुई प्रतिमा
देवी दुर्गा की प्रतिमा बनाना केवल एक कलात्मक काम नहीं, बल्कि कलाकारों के लिए आस्था और परंपरा से जुड़ा कार्य भी है। प्रतिमा के निर्माण में मिट्टी से लेकर आकार देने, चेहरे की बनावट, आभूषणों और रंगों तक हर चरण में विशेष ध्यान रखा जाता है।
12 फीट ऊंची प्रतिमा को तैयार करने में कलाकारों को लगभग ढाई महीने का समय लगा। इतनी बड़ी प्रतिमा बनाने के लिए अनुभव, धैर्य और कुशल कारीगरी की जरूरत होती है। देवी के चेहरे की भाव-भंगिमा, आंखों की बनावट और प्रतिमा के विभिन्न हिस्सों को आकर्षक रूप देने के लिए कलाकार बारीकी से काम करते हैं।
मुर्शिदाबाद से लाई जाती है मिट्टी
इस प्रतिमा निर्माण की खास बात मिट्टी का चयन भी है। जानकारी के मुताबिक, प्रतिमा बनाने के लिए पश्चिम बंगाल के मुर्शिदाबाद तक से मिट्टी लाई जाती है। देवी प्रतिमा निर्माण में मिट्टी की गुणवत्ता महत्वपूर्ण होती है, क्योंकि इससे प्रतिमा का आकार, सतह और अंतिम रूप प्रभावित होता है।
बंगाल में दुर्गा प्रतिमा बनाने की परंपरा का विशेष सांस्कृतिक महत्व है। वहां के कई पारंपरिक कलाकार पीढ़ियों से इस कला को आगे बढ़ाते आए हैं। नेपानगर में भी बंगाली कलाकारों द्वारा प्रतिमा निर्माण इसी सांस्कृतिक विरासत से जुड़ा माना जाता है।
1982 से निभा रहे परंपरा
नेपानगर में वर्ष 1982 से देवी प्रतिमा बनाने का सिलसिला जारी है। इतने लंबे समय तक इस कला को बनाए रखना कलाकारों की लगन और परंपरा के प्रति समर्पण को दर्शाता है। समय के साथ पूजा के आयोजन और प्रतिमाओं की सजावट में बदलाव आए हों, लेकिन पारंपरिक तरीके से प्रतिमा तैयार करने का महत्व बना हुआ है।
दुर्गा पूजा के दौरान देवी प्रतिमाएं श्रद्धालुओं के आकर्षण का केंद्र रहती हैं। प्रतिमा निर्माण की प्रक्रिया में कलाकारों की मेहनत और कौशल का योगदान अहम होता है। प्रतिमा तैयार होने के बाद पूजा पंडाल में उसकी स्थापना की जाती है, जहां श्रद्धालु मां दुर्गा के दर्शन करते हैं।
कला के साथ जुड़ी है आस्था
दुर्गा प्रतिमा निर्माण में कलाकारों को कई चरणों से गुजरना पड़ता है। पहले ढांचा तैयार किया जाता है, फिर मिट्टी की परतों से प्रतिमा को आकार दिया जाता है। इसके बाद सूखने, रंगाई और सजावट का काम होता है। हर चरण में सावधानी जरूरी होती है, ताकि प्रतिमा मजबूत और आकर्षक बने।
नेपानगर में दशकों से चल रही यह परंपरा स्थानीय धार्मिक आयोजनों के साथ बंगाली संस्कृति की पहचान को भी सामने लाती है। 12 फीट ऊंची प्रतिमा को तैयार करने में लगे ढाई महीने इस बात का प्रमाण हैं कि देवी प्रतिमा निर्माण केवल काम नहीं, बल्कि हुनर, धैर्य और श्रद्धा का संगम है।

