बांधवगढ़ में बाघों के बीच मिली घायल भालू शावक ‘लूना’ की बची जान, वन विभाग के रेस्क्यू से मिली नई जिंदगी
मध्यप्रदेश के बांधवगढ़ टाइगर रिजर्व के बफर जोन में जिंदगी और मौत से जूझ रही एक पांच माह की स्लॉथ भालू शावक ‘लूना’ को समय रहते बचा लिया गया। जंगल में बाघों के बीच गंभीर रूप से घायल और अकेली मिली लूना के जीवित बचने की संभावना बेहद कम मानी जा रही थी, लेकिन मध्यप्रदेश वन विभाग की तत्परता से अब उसे नई जिंदगी मिल रही है।
रेस्क्यू के बाद लूना को भोपाल स्थित वन विहार भालू बचाव केंद्र लाया गया, जहां विशेषज्ञों की निगरानी में उसका उपचार किया जा रहा है। इलाज के दौरान उसकी हालत में लगातार सुधार देखने को मिल रहा है। वन विभाग के अधिकारियों और चिकित्सकों की टीम उसकी सेहत पर लगातार नजर बनाए हुए है।
जानकारी के अनुसार, बांधवगढ़ टाइगर रिजर्व के बफर क्षेत्र में गश्त के दौरान वन अमले को एक छोटी भालू शावक घायल अवस्था में मिली थी। शावक काफी कमजोर थी और उसके शरीर पर गंभीर चोटों के निशान थे। आसपास बाघों की मौजूदगी के कारण उसकी जान को बड़ा खतरा था। ऐसे हालात में वन विभाग की टीम ने तुरंत कार्रवाई करते हुए उसे सुरक्षित बाहर निकाला।
रेस्क्यू टीम ने प्राथमिक उपचार के बाद लूना को बेहतर इलाज के लिए भोपाल भेजा। वन विहार के भालू बचाव केंद्र में पहुंचने के बाद विशेषज्ञों ने उसकी स्वास्थ्य जांच की और उपचार शुरू किया। डॉक्टरों के अनुसार, शुरुआती हालत बेहद नाजुक थी, लेकिन अब दवाओं, देखभाल और नियमित निगरानी के चलते उसकी स्थिति बेहतर हो रही है।
वन्यजीव विशेषज्ञों का कहना है कि इतनी कम उम्र के शावक का जंगल में अकेले जीवित रहना काफी मुश्किल होता है। खासकर जब वह घायल हो और आसपास शिकारी वन्यजीवों का खतरा मौजूद हो। ऐसे में समय पर किया गया रेस्क्यू उसकी जिंदगी बचाने में महत्वपूर्ण साबित हुआ।
वन विभाग की टीम अब लूना के पूर्ण स्वस्थ होने का इंतजार कर रही है। स्वस्थ होने के बाद उसके भविष्य को लेकर विशेषज्ञों की सलाह के आधार पर निर्णय लिया जाएगा। यदि वह प्राकृतिक वातावरण में लौटने के लिए सक्षम पाई जाती है तो उसे जंगल में छोड़े जाने पर भी विचार किया जा सकता है।
बांधवगढ़ टाइगर रिजर्व में वन विभाग की यह कार्रवाई वन्यजीव संरक्षण के प्रति उसकी प्रतिबद्धता को दर्शाती है। एक छोटी सी भालू शावक को बचाने के इस प्रयास की वन्यजीव प्रेमियों ने भी सराहना की है। लूना की कहानी अब जंगल से बचाव केंद्र तक पहुंचकर संरक्षण की एक उम्मीद बन गई है।

