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बांस और बुरादे से बनाई 3 फीट की गणेश प्रतिमा, भोपाल के धर्मेंद्र बने ‘बैम्बू मैन’; 20 साल से पारंपरिक शिल्प में कर रहे नए प्रयोग

बांस और बुरादे से बनाई 3 फीट की गणेश प्रतिमा, भोपाल के धर्मेंद्र बने ‘बैम्बू मैन’; 20 साल से पारंपरिक शिल्प में कर रहे नए प्रयोग

मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल के धर्मेंद्र अपनी अनोखी कला और रचनात्मक प्रयोगों के कारण अलग पहचान बना रहे हैं। बांस और लकड़ी के बुरादे जैसी सामग्री से गणेश प्रतिमा तैयार कर उन्होंने पारंपरिक शिल्प को नया रूप देने की कोशिश की है। करीब 3 फीट ऊंची गणेश प्रतिमा उनकी कलात्मक सोच और मेहनत का उदाहरण है। बांस से जुड़ी कला में लगातार प्रयोग करने के कारण उन्हें ‘बैम्बू मैन’ के नाम से पहचान मिली है। धर्मेंद्र पिछले करीब 20 वर्षों से पारंपरिक शिल्प को नए अंदाज में प्रस्तुत करने में जुटे हैं।

बांस और बुरादे से तैयार की अनोखी गणेश प्रतिमा

भगवान गणेश की प्रतिमाएं आमतौर पर मिट्टी, पत्थर, धातु और प्लास्टर जैसी सामग्रियों से बनाई जाती हैं। लेकिन धर्मेंद्र ने बांस और लकड़ी के बुरादे का इस्तेमाल करके एक अलग तरह की प्रतिमा तैयार की। लगभग 3 फीट ऊंची इस गणेश प्रतिमा में प्राकृतिक सामग्री का उपयोग उनकी कला को खास बनाता है।

बांस हल्का होने के साथ-साथ मजबूत भी होता है। वहीं लकड़ी का बुरादा शिल्प निर्माण में अलग-अलग रूपों में इस्तेमाल किया जा सकता है। इन सामग्रियों को कलात्मक तरीके से आकार देकर प्रतिमा बनाना कौशल, धैर्य और बारीकी से काम करने की मांग करता है। धर्मेंद्र का यह प्रयोग दिखाता है कि पारंपरिक सामग्री का इस्तेमाल करके भी नई और आकर्षक कलाकृतियां बनाई जा सकती हैं।

20 साल से पारंपरिक शिल्प में कर रहे प्रयोग

धर्मेंद्र करीब दो दशक से शिल्प कला के क्षेत्र में नए प्रयोग कर रहे हैं। उनका काम केवल पारंपरिक तरीके से वस्तुएं बनाने तक सीमित नहीं है, बल्कि वे प्राकृतिक सामग्री की संभावनाओं को भी तलाशते हैं। बांस जैसी सामग्री को नए आकार और उपयोग देना उनके काम का महत्वपूर्ण हिस्सा है।

पारंपरिक शिल्प भारत की सांस्कृतिक विरासत का अहम हिस्सा रहा है। अलग-अलग क्षेत्रों में कारीगर स्थानीय संसाधनों और पीढ़ियों से चले आ रहे कौशल के आधार पर कलाकृतियां तैयार करते हैं। समय के साथ इन कलाओं में नए डिजाइन और तकनीक जुड़ने से इन्हें आधुनिक जरूरतों के अनुरूप प्रस्तुत करने के अवसर मिलते हैं। धर्मेंद्र के प्रयोग इसी दिशा में एक उदाहरण हैं।

‘बैम्बू मैन’ के नाम से मिली पहचान

बांस से जुड़ी कलाकृतियों और नए प्रयोगों के कारण धर्मेंद्र को ‘बैम्बू मैन’ कहा जाने लगा। यह पहचान उनके काम की विशिष्टता को दर्शाती है। बांस का उपयोग पारंपरिक रूप से घरों, फर्नीचर, सजावटी सामान और हस्तशिल्प की वस्तुएं बनाने में किया जाता रहा है। रचनात्मक प्रयोगों के जरिए इसी सामग्री को धार्मिक प्रतिमाओं और दूसरी कलाकृतियों के रूप में भी प्रस्तुत किया जा सकता है।

ऐसे प्रयास स्थानीय शिल्प और प्राकृतिक संसाधनों पर आधारित कला को लोगों के सामने लाने में मदद कर सकते हैं। साथ ही, नई पीढ़ी को पारंपरिक हुनर सीखने और उसे नए तरीके से विकसित करने की प्रेरणा मिल सकती है।

प्राकृतिक सामग्री से कला को नया रूप देने की कोशिश

आज पर्यावरण के अनुकूल विकल्पों और प्राकृतिक सामग्रियों से बने उत्पादों को लेकर भी लोगों की दिलचस्पी बढ़ रही है। बांस और लकड़ी के बुरादे जैसी सामग्री का इस्तेमाल रचनात्मक शिल्प में नई संभावनाएं पैदा करता है। हालांकि, किसी प्रतिमा की पर्यावरण अनुकूलता इस बात पर भी निर्भर करती है कि उसे बनाने में किस तरह के रंग, गोंद और अन्य पदार्थों का उपयोग किया गया है।

धर्मेंद्र की 3 फीट ऊंची गणेश प्रतिमा उनकी दो दशक की शिल्प यात्रा और प्रयोगधर्मिता को सामने लाती है। उनकी कहानी यह संदेश देती है कि पारंपरिक कला को जीवित रखने के लिए नई सोच और लगातार सीखते रहना जरूरी है। स्थानीय सामग्री, हुनर और कल्पनाशीलता के मेल से कला के नए रूप विकसित किए जा सकते हैं।

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