भोपाल में 34 साल बाद हटा कब्जा, कोर्ट डिक्री के बाद 23 मकान और 25 दुकानें जमींदोज
भोपाल के नारियलखेड़ा इलाके में निजी जमीन पर किए गए कब्जे को हटाने में प्रशासन को 34 साल लग गए। कोर्ट की डिक्री के बावजूद वर्षों से लंबित इस मामले में आखिरकार जिला प्रशासन और नगर निगम की संयुक्त कार्रवाई हुई। प्रशासन ने करीब 15 हजार वर्गफीट जमीन से कब्जा हटाते हुए वहां बने 23 मकान और 25 दुकानों को हटा दिया।
यह मामला न्यायिक आदेशों के बावजूद लंबे समय से अटका हुआ था। जमीन मालिक के पक्ष में वर्ष 1992 में कोर्ट ने डिक्री जारी कर दी थी, लेकिन इसके बाद भी कब्जा हटाने की प्रक्रिया पूरी नहीं हो सकी। कब्जा हटाने के लिए प्रशासन की ओर से 50 से ज्यादा आदेश जारी किए गए, लेकिन अलग-अलग कारणों से कार्रवाई टलती रही।
19 कलेक्टर बदले, फिर भी नहीं हुई कार्रवाई
मामले की लंबी अवधि का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि जब से कोर्ट का आदेश आया, तब से अब तक भोपाल में 19 कलेक्टर बदल चुके हैं। इतने लंबे समय तक प्रशासनिक स्तर पर प्रक्रिया चलती रही, लेकिन जमीन को कब्जामुक्त नहीं कराया जा सका।
आखिरकार वर्तमान प्रशासन ने कोर्ट के आदेश का पालन करते हुए कार्रवाई की। जिला प्रशासन और नगर निगम की टीम पुलिस बल के साथ मौके पर पहुंची और अवैध निर्माण हटाने की कार्रवाई शुरू की। कार्रवाई के दौरान बड़ी संख्या में अधिकारी और कर्मचारी मौजूद रहे।
15 हजार वर्गफीट जमीन हुई कब्जामुक्त
प्रशासन की कार्रवाई के बाद करीब 15 हजार वर्गफीट जमीन को कब्जामुक्त कराया गया। इस जमीन पर लंबे समय से मकान और दुकानें संचालित हो रही थीं। कार्रवाई के दौरान 23 मकानों और 25 दुकानों को हटाया गया।
प्रशासन का कहना है कि यह कार्रवाई पूरी तरह न्यायालय के आदेश के पालन में की गई है। कोर्ट की डिक्री जमीन मालिक के पक्ष में होने के बावजूद कब्जा नहीं हट पाने के कारण मामला वर्षों से लंबित था। अब प्रशासन ने सभी कानूनी प्रक्रियाओं को पूरा करते हुए जमीन खाली कराई है।
लंबे विवाद के बाद मिली राहत
जमीन मालिक पक्ष के लिए यह कार्रवाई लंबे इंतजार के बाद मिली राहत के रूप में देखी जा रही है। 1992 में पक्ष में फैसला आने के बाद भी उन्हें जमीन का वास्तविक कब्जा पाने के लिए तीन दशक से ज्यादा समय तक इंतजार करना पड़ा।
वहीं, जिन लोगों के मकान और दुकानें हटाई गईं, उनके सामने अब पुनर्वास और वैकल्पिक व्यवस्था का सवाल खड़ा हो गया है। प्रशासन की ओर से फिलहाल इस संबंध में कोई विस्तृत जानकारी सामने नहीं आई है।
भोपाल में हुई यह कार्रवाई इस बात का उदाहरण है कि न्यायालय के आदेश के बावजूद प्रशासनिक प्रक्रिया में देरी होने से कई मामले दशकों तक लंबित रह जाते हैं। अब 34 साल बाद नारियलखेड़ा की जमीन को कब्जामुक्त कराया गया है। प्रशासन का कहना है कि आगे भी न्यायालय के आदेशों के पालन में ऐसी कार्रवाई जारी रहेगी।

