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एक ही कमरे में पढ़ रहे पहली से पांचवीं तक के 123 बच्चे, चार शिक्षक संभाल रहे पूरी कक्षा

एक ही कमरे में पढ़ रहे पहली से पांचवीं तक के 123 बच्चे, चार शिक्षक संभाल रहे पूरी कक्षा

सरकारी स्कूलों में बेहतर शिक्षा व्यवस्था के दावों के बीच एक ऐसी तस्वीर सामने आई है, जो व्यवस्था की खामियों को उजागर कर रही है। यहां पहली से पांचवीं कक्षा तक के 123 बच्चों को एक ही कमरे में पढ़ाया जा रहा है। हालात यह हैं कि इसी एक कमरे में चार शिक्षक बच्चों को पढ़ाने के साथ-साथ स्कूल का ऑफिस और किचन भी संचालित कर रहे हैं।

स्कूल में जगह की कमी के कारण छात्रों और शिक्षकों को काफी परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है। एक ही कक्ष में अलग-अलग कक्षाओं के बच्चों को बैठाकर पढ़ाना शिक्षकों के लिए भी चुनौती बन गया है। जहां एक तरफ शिक्षक सभी कक्षाओं के विद्यार्थियों को अलग-अलग विषय पढ़ाने का प्रयास करते हैं, वहीं दूसरी ओर बच्चों का ध्यान भी बार-बार भटकता रहता है।

जानकारी के अनुसार, स्कूल में पहली से पांचवीं तक कुल 123 विद्यार्थी दर्ज हैं। इन बच्चों के लिए पर्याप्त कक्ष उपलब्ध नहीं हैं। मजबूरी में सभी कक्षाओं को एक ही कमरे में संचालित किया जा रहा है। इसके अलावा स्कूल का कार्यालय और मध्यान्ह भोजन बनाने के लिए किचन की व्यवस्था भी इसी कमरे में की गई है।

स्कूल की इस स्थिति से अभिभावकों में भी नाराजगी है। उनका कहना है कि बच्चों को बेहतर शिक्षा देने के लिए स्कूलों में मूलभूत सुविधाएं उपलब्ध होना जरूरी है। एक ही कमरे में इतनी बड़ी संख्या में बच्चों के बैठने से पढ़ाई प्रभावित हो रही है और बच्चों को जरूरी शैक्षणिक माहौल नहीं मिल पा रहा है।

वहीं, शिक्षकों का कहना है कि वे सीमित संसाधनों के बावजूद बच्चों को अच्छी शिक्षा देने का प्रयास कर रहे हैं, लेकिन जगह की कमी के कारण कई परेशानियां आती हैं। अलग-अलग कक्षाओं के विद्यार्थियों को एक साथ पढ़ाना आसान नहीं होता। इसके चलते शिक्षण कार्य प्रभावित हो रहा है।

स्थानीय लोगों ने शिक्षा विभाग के अधिकारियों से स्कूल में अतिरिक्त कक्षों का निर्माण कराने और सुविधाएं बढ़ाने की मांग की है। उनका कहना है कि बच्चों के भविष्य को देखते हुए इस समस्या का जल्द समाधान किया जाना चाहिए।

सरकार की ओर से लगातार सरकारी स्कूलों में सुविधाएं बढ़ाने और शिक्षा की गुणवत्ता सुधारने के दावे किए जाते हैं, लेकिन जमीनी स्तर पर ऐसी तस्वीरें उन दावों पर सवाल खड़े करती हैं। अब देखना होगा कि शिक्षा विभाग इस मामले में कब तक कदम उठाता है और बच्चों को बेहतर शैक्षणिक माहौल उपलब्ध कराया जाता है।

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