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स्वर्ण पदक विजेता दिव्यांग खिलाड़ी की संघर्षभरी कहानी, 10 साल से खेल निदेशालय में झाड़ू लगाने को मजबूर

स्वर्ण पदक विजेता दिव्यांग खिलाड़ी की संघर्षभरी कहानी, 10 साल से खेल निदेशालय में झाड़ू लगाने को मजबूर

खेल जगत में देश का नाम रोशन करने वाली राष्ट्रीय स्तर की स्वर्ण पदक विजेता दिव्यांग खिलाड़ी Sunita Kumari की कहानी इन दिनों चर्चा में है। खेल उपलब्धियों के बावजूद सुनीता कुमारी पिछले 10 वर्षों से झारखंड की राजधानी Ranchi स्थित खेल निदेशालय में झाड़ू लगाने का काम कर रही हैं।

राष्ट्रीय स्तर पर जीता स्वर्ण पदक

सुनीता कुमारी ने दिव्यांग खेल प्रतियोगिताओं में उत्कृष्ट प्रदर्शन करते हुए राष्ट्रीय स्तर पर स्वर्ण पदक हासिल किया था। उनकी उपलब्धि ने न केवल राज्य बल्कि देश का भी गौरव बढ़ाया। बावजूद इसके, उन्हें खेल के क्षेत्र में उनकी प्रतिभा के अनुरूप अवसर और सम्मान नहीं मिल सका।

10 वर्षों से कर रही हैं सफाई का काम

रिपोर्ट्स के अनुसार, सुनीता कुमारी पिछले एक दशक से रांची के खेल निदेशालय में सफाई कर्मचारी के रूप में कार्यरत हैं। एक स्वर्ण पदक विजेता खिलाड़ी का इस स्थिति में काम करना खेल व्यवस्था और खिलाड़ियों के पुनर्वास से जुड़े सवाल खड़े करता है।

आर्थिक और सामाजिक चुनौतियों का सामना

खेलों में उपलब्धियां हासिल करने के बावजूद सुनीता को आर्थिक कठिनाइयों का सामना करना पड़ा। पर्याप्त सहायता और रोजगार के बेहतर अवसर नहीं मिलने के कारण उन्हें यह काम करना पड़ रहा है। उनकी कहानी उन खिलाड़ियों की चुनौतियों को भी उजागर करती है जो खेल करियर के बाद सम्मानजनक आजीविका के लिए संघर्ष करते हैं।

खिलाड़ियों के समर्थन पर उठे सवाल

सुनीता कुमारी का मामला सामने आने के बाद खिलाड़ियों के लिए सरकारी सहायता, रोजगार योजनाओं और खेल नीति को लेकर बहस तेज हो गई है। खेल विशेषज्ञों का मानना है कि राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पदक जीतने वाले खिलाड़ियों के लिए बेहतर पुनर्वास और रोजगार व्यवस्था सुनिश्चित की जानी चाहिए।

प्रेरणा और संघर्ष की मिसाल

कठिन परिस्थितियों के बावजूद सुनीता कुमारी ने हार नहीं मानी। उनका संघर्ष कई खिलाड़ियों के लिए प्रेरणा का स्रोत है, जो सीमित संसाधनों के बावजूद अपने सपनों को पूरा करने का प्रयास कर रहे हैं।

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