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'साहब मैं जिंदा हूं, मुझे कागजों में मत मारिए...', झारखंड में सिस्टम की लापरवाही, दर-दर भटक रहा बुजुर्ग

'साहब मैं जिंदा हूं, मुझे कागजों में मत मारिए...', झारखंड में सिस्टम की लापरवाही, दर-दर भटक रहा बुजुर्ग

झारखंड से एक ऐसा मामला सामने आया है, जिसने प्रशासनिक व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। एक बुजुर्ग व्यक्ति खुद को जिंदा साबित करने के लिए सरकारी दफ्तरों के चक्कर काट रहा है और गुहार लगा रहा है—“साहब मैं जिंदा हूं, मुझे कागजों में मत मारिए।”

दस्तावेजों में ‘मृत’ दिखाया गया बुजुर्ग

मामला कथित तौर पर सरकारी रिकॉर्ड में हुई गलती से जुड़ा है, जिसमें बुजुर्ग को जीवित होते हुए भी मृत घोषित कर दिया गया। इसके बाद उसकी पेंशन और अन्य सरकारी लाभ बंद हो गए। जब बुजुर्ग को इस बात की जानकारी मिली तो उसने अधिकारियों से संपर्क किया, लेकिन समस्या का समाधान नहीं हो सका।

दर-दर भटकने को मजबूर

पीड़ित बुजुर्ग अब लगातार ब्लॉक कार्यालय, तहसील और अन्य सरकारी दफ्तरों के चक्कर काट रहा है। हर जगह उसे सिर्फ आश्वासन मिल रहा है, लेकिन सुधार की प्रक्रिया आगे नहीं बढ़ पा रही। आर्थिक रूप से कमजोर होने के कारण उसे रोजमर्रा की जिंदगी में भी कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा है।

सिस्टम पर उठे सवाल

इस घटना ने एक बार फिर ग्रामीण प्रशासनिक व्यवस्था और रिकॉर्ड प्रबंधन पर सवाल खड़े कर दिए हैं। स्थानीय लोगों का कहना है कि ऐसी गलतियां केवल कागजों में नहीं, बल्कि लोगों की जिंदगी पर भारी पड़ती हैं।

विशेषज्ञों के मुताबिक, डिजिटल रिकॉर्डिंग सिस्टम होने के बावजूद ऐसी त्रुटियां यह दर्शाती हैं कि फील्ड स्तर पर सत्यापन प्रक्रिया अभी भी कमजोर है।

प्रशासन ने दिया जांच का आश्वासन

मामला सामने आने के बाद प्रशासन ने जांच का आश्वासन दिया है। अधिकारियों का कहना है कि रिकॉर्ड की जांच की जा रही है और जल्द ही गलती को सुधारने की प्रक्रिया शुरू की जाएगी।

साथ ही संबंधित विभाग को निर्देश दिया गया है कि ऐसे मामलों में तुरंत सुधार सुनिश्चित किया जाए, ताकि किसी भी नागरिक को अनावश्यक परेशानी न उठानी पड़े।

परिवार और स्थानीय लोगों में नाराजगी

बुजुर्ग के परिवार और स्थानीय लोगों में इस लापरवाही को लेकर नाराजगी है। उनका कहना है कि अगर समय पर कार्रवाई नहीं हुई तो बुजुर्ग को गंभीर आर्थिक और मानसिक संकट का सामना करना पड़ सकता है।

एक छोटी गलती, बड़ा दर्द

यह मामला दिखाता है कि सरकारी रिकॉर्ड में छोटी सी गलती भी किसी व्यक्ति के जीवन को कितना प्रभावित कर सकती है। अब सबकी नजर प्रशासन की कार्रवाई पर टिकी हुई है कि बुजुर्ग को कब “कागजों में जिंदा” किया जाता है।

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