Samachar Nama
×

एक धमाका और 168 जिंदगियां खत्म, भारत के सबसे भयावह खदान हादसों में से एक था धोरी त्रासदी

एक धमाका और 168 जिंदगियां खत्म, भारत के सबसे भयावह खदान हादसों में से एक था धोरी त्रासदी

भारतीय कोयला खनन के इतिहास में 30 मई 1965 का दिन एक काले अध्याय के रूप में दर्ज है। उस समय धनबाद क्षेत्र अविभाजित बिहार का हिस्सा था, जो आज झारखंड में स्थित है। इसी दिन धनबाद के धोरी कोलियरी में ऐसा भीषण हादसा हुआ जिसने पूरे देश को झकझोर कर रख दिया। एक अचानक हुए विस्फोट में 168 मजदूरों की जान चली गई और दर्जनों परिवार हमेशा के लिए उजड़ गए।

उस दिन खदान में कामकाज सामान्य रूप से चल रहा था। कई मजदूर भूमिगत सुरंगों में कोयला निकालने में जुटे थे, जबकि कुछ अपनी शिफ्ट पूरी कर बाहर निकलने की तैयारी कर रहे थे। किसी को अंदाजा नहीं था कि कुछ ही पलों में एक भयानक त्रासदी उनका इंतजार कर रही है।

अचानक हुआ जोरदार विस्फोट

प्रत्यक्षदर्शियों और उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार, खदान के भीतर अचानक एक भीषण धमाका हुआ। विस्फोट इतना शक्तिशाली था कि भूमिगत सुरंगें धुएं और जहरीली गैसों से भर गईं। कई मजदूर धमाके की चपेट में आ गए, जबकि बड़ी संख्या में लोग अंदर ही फंस गए।

धमाके के बाद पूरे इलाके में अफरा-तफरी मच गई। बचाव दल और स्थानीय प्रशासन तुरंत मौके पर पहुंचे, लेकिन भूमिगत हालात बेहद चुनौतीपूर्ण थे। जहरीली गैसों और धुएं के कारण राहत कार्यों में भी कठिनाई आई।

168 मजदूरों की गई जान

इस हादसे में कुल 168 मजदूरों की मौत हो गई। यह उस दौर के सबसे बड़े खनन हादसों में से एक माना जाता है। कई मजदूरों के शवों को बाहर निकालने में लंबा समय लगा। हादसे के बाद पूरे क्षेत्र में शोक की लहर दौड़ गई और मृतकों के परिवारों पर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा।

सुरक्षा व्यवस्था पर उठे सवाल

धोरी खदान हादसे के बाद देशभर में खदानों की सुरक्षा व्यवस्था को लेकर गंभीर सवाल उठे। विशेषज्ञों ने खदानों में गैस नियंत्रण, वेंटिलेशन सिस्टम और सुरक्षा मानकों को और मजबूत बनाने की आवश्यकता पर जोर दिया। इस घटना ने कोयला उद्योग में सुरक्षा नियमों की समीक्षा की दिशा में महत्वपूर्ण बहस को जन्म दिया।

आज भी याद की जाती है त्रासदी

धोरी खदान हादसे को छह दशक से अधिक समय बीत चुके हैं, लेकिन यह घटना आज भी लोगों की स्मृतियों में जिंदा है। हर साल इस दिन उन मजदूरों को श्रद्धांजलि दी जाती है जिन्होंने अपने काम के दौरान जान गंवाई थी।

यह हादसा केवल एक औद्योगिक दुर्घटना नहीं था, बल्कि उन सैकड़ों परिवारों की पीड़ा की कहानी भी है, जिन्होंने अपने प्रियजनों को खो दिया। धोरी खदान त्रासदी आज भी इस बात की याद दिलाती है कि औद्योगिक विकास के साथ-साथ श्रमिकों की सुरक्षा सर्वोच्च प्राथमिकता होनी चाहिए।

Share this story

Tags