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पत्नी 15 हजार रुपये महीना कमाती है, फिर भी पति को देना होगा गुजारा भत्ता; हिमाचल हाईकोर्ट का फैसला

पत्नी 15 हजार रुपये महीना कमाती है, फिर भी पति को देना होगा गुजारा भत्ता; हिमाचल हाईकोर्ट का फैसला

हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने गुजारा भत्ता यानी भरण-पोषण से जुड़े एक मामले में अहम फैसला सुनाया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि पत्नी के हर महीने करीब 15 हजार रुपये कमाने के बावजूद पति अपनी जिम्मेदारी से मुक्त नहीं हो सकता, खासकर तब जब पत्नी की नौकरी अस्थायी या अनुबंध आधारित हो। हाईकोर्ट ने फैमिली कोर्ट के उस आदेश को बरकरार रखा, जिसमें पति को पत्नी को हर महीने 4,000 रुपये गुजारा भत्ता देने का निर्देश दिया गया था।

क्या है पूरा मामला?

मामला हिमाचल प्रदेश के ऊना से जुड़ा है। पति मनीष कुमार ने फैमिली कोर्ट के आदेश को हाईकोर्ट में चुनौती दी थी। फैमिली कोर्ट ने उसे अपनी पत्नी को हर महीने 4,000 रुपये भरण-पोषण के तौर पर देने का आदेश दिया था। पति ने इस फैसले पर सवाल उठाते हुए कहा कि उसकी खुद की आमदनी कम है और पत्नी नौकरी करके पैसे कमा रही है।

पति के अनुसार, वह लैब अटेंडेंट के रूप में काम करता है और उसे हर महीने 10,500 रुपये वेतन मिलता है। वहीं, उसकी पत्नी जवाहर नवोदय विद्यालय में अनुबंध के आधार पर मैट्रन के पद पर काम कर रही है। पत्नी को प्रतिदिन 541 रुपये मिलने की जानकारी सामने आई, जिसके आधार पर उसकी मासिक आमदनी करीब 15 हजार रुपये बताई गई। पति ने दलील दी कि पत्नी की अपनी कमाई होने के कारण उसे गुजारा भत्ता देने का आदेश उचित नहीं है।

हाईकोर्ट ने क्या कहा?

मामले की सुनवाई न्यायमूर्ति अजय मोहन गोयल और न्यायमूर्ति योगेश जसवाल की खंडपीठ ने की। अदालत ने पति की दलीलों को स्वीकार नहीं किया। हाईकोर्ट ने कहा कि पत्नी का अनुबंध आधारित रोजगार स्थायी आर्थिक सुरक्षा की गारंटी नहीं देता। केवल इस आधार पर कि पत्नी अपनी आजीविका के लिए कुछ पैसे कमा रही है, पति को भरण-पोषण की जिम्मेदारी से मुक्त नहीं किया जा सकता।

अदालत ने यह भी ध्यान में रखा कि पति स्वस्थ और शिक्षित है। ऐसे में पत्नी के भरण-पोषण के लिए पर्याप्त संसाधन जुटाने की जिम्मेदारी से वह केवल अपनी कम आमदनी का हवाला देकर नहीं बच सकता।

हर महीने 4,000 रुपये देने का आदेश बरकरार

हाईकोर्ट ने फैमिली कोर्ट द्वारा तय की गई 4,000 रुपये प्रति माह की राशि को अनुचित या अत्यधिक नहीं माना। अदालत ने पति की पुनरीक्षण याचिका खारिज कर दी और निचली अदालत के आदेश को बरकरार रखा। इसका मतलब है कि पति को अपनी पत्नी को हर महीने 4,000 रुपये गुजारा भत्ता देना होगा।

फैसले से क्या समझें?

इस मामले से स्पष्ट होता है कि पत्नी की नौकरी या कुछ आमदनी होना अपने आप में गुजारा भत्ता पाने के अधिकार को खत्म नहीं करता। अदालत मामले की परिस्थितियों, दोनों पक्षों की आर्थिक स्थिति, नौकरी की स्थिरता और भरण-पोषण की जरूरतों को ध्यान में रख सकती है।

हालांकि, इसका यह अर्थ नहीं है कि हर मामले में नौकरी करने वाली पत्नी को अनिवार्य रूप से गुजारा भत्ता मिलेगा। फैसला संबंधित मामले के तथ्यों और परिस्थितियों के आधार पर किया जाता है।

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