नेपाल जैसी तबाही का खतरा, हिमाचल में 67 ग्लेशियल झीलें चिन्हित; 4 झीलों पर लगेगा अर्ली वार्निंग सिस्टम
नेपाल में ग्लेशियर से जुड़ी भीषण तबाही ने पूरे हिमालयी क्षेत्र में चिंता बढ़ा दी है। इस घटना के बाद हिमाचल प्रदेश सरकार भी ग्लेशियल झीलों से पैदा होने वाले संभावित खतरे को लेकर अलर्ट हो गई है। हिमाचल प्रदेश में 67 ऐसी ग्लेशियल झीलों की पहचान की गई है, जिन्हें जोखिम की दृष्टि से संवेदनशील माना गया है। इनमें से चार सबसे अधिक खतरे वाली झीलों के लिए अर्ली वार्निंग सिस्टम स्थापित करने की योजना बनाई जा रही है।
ग्लेशियल झीलें ऊंचाई वाले इलाकों में ग्लेशियरों के पिघलने से बनने वाले जलाशय हैं। अगर इन झीलों को रोकने वाली प्राकृतिक बर्फ या मलबे की बांध जैसी संरचना अचानक टूट जाती है तो भारी मात्रा में पानी नीचे की ओर तेजी से बह सकता है। इसे ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड यानी GLOF कहा जाता है। ऐसे हादसे पहाड़ी इलाकों में नदी घाटियों, सड़कों, पुलों, बस्तियों और बिजली परियोजनाओं को भारी नुकसान पहुंचा सकते हैं।
किन्नौर और लाहौल-स्पीति पर विशेष नजर
हिमाचल में चिन्हित 67 संवेदनशील ग्लेशियल झीलों में कई बेहद ऊंचाई और दुर्गम इलाकों में स्थित हैं। फिलहाल किन्नौर और लाहौल-स्पीति की चार सबसे जोखिम वाली झीलों पर शुरुआती चेतावनी प्रणाली लगाने की तैयारी है। इसका उद्देश्य झील या आसपास के क्षेत्र में अचानक होने वाले बदलाव की जानकारी समय रहते हासिल करना और संभावित खतरे की स्थिति में नीचे रहने वाली आबादी को अलर्ट करना है।
अर्ली वार्निंग सिस्टम किसी संभावित GLOF की स्थिति में सबसे महत्वपूर्ण सुरक्षा उपायों में से एक माना जाता है। समय पर सूचना मिलने से प्रशासन को लोगों को सुरक्षित स्थानों पर पहुंचाने, संवेदनशील इलाकों में आवाजाही रोकने और राहत-बचाव दलों को पहले से तैयार करने का अवसर मिल सकता है।
लगातार पिघल रहे ग्लेशियर बढ़ा रहे चुनौती
विशेषज्ञों के मुताबिक बढ़ते तापमान और जलवायु परिवर्तन के कारण हिमालयी क्षेत्र में ग्लेशियर तेजी से पीछे हट रहे हैं। इससे कई जगह ग्लेशियल झीलों का आकार और पानी की मात्रा बढ़ सकती है। साथ ही प्राकृतिक बांधों की स्थिरता पर भी असर पड़ने की आशंका रहती है।
हालिया नेपाल त्रासदी ने इस खतरे को और गंभीरता से समझने की जरूरत सामने रखी है। संयुक्त राष्ट्र के अधिकारियों और विशेषज्ञों ने भी हिमालय में ग्लेशियर से जुड़ी बाढ़ के बढ़ते जोखिम को लेकर चेतावनी दी है।
सिर्फ चेतावनी नहीं, निगरानी भी जरूरी
हिमाचल में अब चुनौती केवल संवेदनशील झीलों की पहचान तक सीमित नहीं है। इन झीलों की लगातार निगरानी, जलस्तर में बदलाव का आकलन, संभावित खतरे वाले क्षेत्रों की मैपिंग और स्थानीय प्रशासन को समय पर सूचना देना भी जरूरी होगा।
इसके साथ ही उन इलाकों में रहने वाले लोगों को GLOF के खतरे के बारे में जागरूक करना और आपात स्थिति में निकासी की स्पष्ट व्यवस्था तैयार करना अहम होगा। विशेषज्ञों का मानना है कि शुरुआती चेतावनी, समुदाय की तैयारी और सुरक्षित भूमि उपयोग योजना जैसे कदम भविष्य में जान-माल के नुकसान को कम करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।
नेपाल की घटना ने हिमाचल समेत पूरे हिमालयी क्षेत्र के लिए साफ संकेत दिया है कि ग्लेशियल झीलों से जुड़े खतरों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। 67 झीलों की पहचान और चार पर अर्ली वार्निंग सिस्टम की योजना इसी दिशा में एक अहम कदम है।

