उत्तराखंड हाईकोर्ट ने बरकरार रखा तलाक का फैसला, कहा- पत्नी का व्यवहार सामान्य वैवाहिक कलह से आगे बढ़ा
उत्तराखंड हाईकोर्ट ने एक तलाक मामले में देहरादून फैमिली कोर्ट के फैसले को बरकरार रखते हुए पत्नी की अपील खारिज कर दी। इस मामले में पति-पत्नी दोनों ही पेशे से वकील हैं। कोर्ट ने रिकॉर्ड पर मौजूद साक्ष्यों के आधार पर माना कि पत्नी का लगातार किया गया व्यवहार सामान्य वैवाहिक मतभेदों की सीमा से आगे बढ़कर मानसिक क्रूरता की श्रेणी में आता है।
मामले की सुनवाई मुख्य न्यायाधीश मनोज कुमार गुप्ता और न्यायमूर्ति सुभाष उपाध्याय की खंडपीठ ने की। दोनों की शादी 3 मार्च 2014 को हुई थी और सितंबर 2015 में उनकी एक बेटी का जन्म हुआ। पति ने 2016 में मानसिक क्रूरता और अलग रहने के आधार पर तलाक की याचिका दायर की थी। देहरादून फैमिली कोर्ट ने 5 अप्रैल 2024 को तलाक मंजूर कर दिया था, जिसके खिलाफ पत्नी ने हाईकोर्ट में अपील की थी।
सुनवाई के दौरान पति की ओर से आरोप लगाया गया कि पत्नी उस पर अपना कॉर्पोरेट वकालत का करियर छोड़कर चंडीगढ़ जाने और अपने माता-पिता से दूरी बनाने का दबाव डालती थी। इसके अलावा सहकर्मियों और परिचितों के सामने कथित तौर पर अपमानित करने तथा परिवार के सदस्यों के साथ दुर्व्यवहार के आरोप भी लगाए गए। पति ने अपने माता-पिता और एक अन्य वकील को भी गवाह के तौर पर पेश किया।
हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि पति-पत्नी के बीच हर विवाद, कभी-कभार गुस्सा या सामान्य मतभेद अपने आप में मानसिक क्रूरता नहीं माना जा सकता। लेकिन इस मामले में अदालत ने पूरे घटनाक्रम और साक्ष्यों को एक साथ देखते हुए माना कि बार-बार अपमान, पेशेवर और निजी फैसलों को लेकर लगातार दबाव तथा पति को उसके माता-पिता से दूर करने की कोशिश जैसे आरोप सामान्य वैवाहिक कलह की सीमा से आगे निकल गए थे।
अदालत ने यह भी कहा कि दोनों पक्ष वकालत के पेशे से जुड़े हैं, इसलिए पेशेवर सहयोगियों और परिचितों के सामने बार-बार अपमान का असर जीवनसाथी की गरिमा पर गंभीर रूप से पड़ सकता है। इसी आधार पर हाईकोर्ट ने फैमिली कोर्ट के तलाक के आदेश को बरकरार रखा।
हालांकि, अदालत ने नाबालिग बेटी की देखभाल मां के पास ही रहने दी और पिता को बेटी से मिलने का अधिकार दिया। कोर्ट ने पत्नी के लिए 40 लाख रुपये स्थायी गुजारा भत्ता और बेटी की शिक्षा एवं कल्याण के लिए 70 लाख रुपये की एकमुश्त राशि देने का भी निर्देश दिया।

