19 साल बाद गूंजी बेटे की किलकारी, 10 बेटियों के बाद भी उम्मीद नहीं हारा फतेहाबाद का यह परिवार
कहते हैं कि उम्मीद का दीया बुझने में वक्त नहीं लगता, लेकिन हरियाणा के एक परिवार ने इस दीये को पूरे 19 साल तक जलाए रखा। हरियाणा के फतेहाबाद जिले के ढाणी भोजराज गांव में रहने वाले संजय और सुनीता के घर आखिरकार बेटे की किलकारी गूंजी है। यह खबर सिर्फ एक नवजात के जन्म की नहीं है, बल्कि इसके पीछे संघर्ष, धैर्य, सामाजिक दबाव और पितृसत्तात्मक सोच से जूझते एक पिता की लंबी कहानी छिपी है।
संजय और सुनीता के घर इससे पहले 10 बेटियों का जन्म हो चुका था। गांव और समाज में जहां बेटे को वंश का चिराग माना जाता है, वहीं लगातार बेटियों के जन्म के बाद इस परिवार को तरह-तरह की बातें और ताने भी सुनने पड़े। संजय बताते हैं कि समाज का दबाव कई बार इतना बढ़ गया था कि लोग खुलेआम सवाल करने लगे थे। कोई कहता था “अब तो उम्मीद छोड़ दो”, तो कोई परिवार बढ़ाने पर तंज कसता था। लेकिन इन सबके बीच संजय और सुनीता ने कभी अपनी बेटियों को बोझ नहीं माना।
संजय कहते हैं कि उनकी सभी बेटियां उनकी ताकत बनीं। उन्होंने बताया कि बेटियां पढ़ाई में अच्छी हैं और घर के कामों में भी पूरा सहयोग करती हैं। सबसे खास बात यह रही कि बेटियां खुद चाहती थीं कि उनके घर एक छोटा सा भाई आए। संजय के मुताबिक, बेटियां अक्सर कहती थीं कि “पापा, हमें भी एक भाई चाहिए, जिसकी हम देखभाल करेंगे।” यह सुनकर उन्हें और हिम्मत मिलती थी।
19 साल का यह इंतजार आसान नहीं था। आर्थिक परेशानियां भी आईं, क्योंकि इतने बड़े परिवार का पालन-पोषण किसी चुनौती से कम नहीं था। इसके बावजूद संजय ने कभी अपनी बेटियों की पढ़ाई या जरूरतों से समझौता नहीं किया। वे कहते हैं कि बेटियां ही उनका सबसे बड़ा सहारा हैं और वही उनकी जिंदगी की असली कमाई हैं।
बेटे के जन्म के बाद जहां परिवार में खुशी का माहौल है, वहीं गांव में भी यह खबर चर्चा का विषय बनी हुई है। कुछ लोग इसे किस्मत का खेल बता रहे हैं, तो कुछ इसे संजय के धैर्य और विश्वास का फल मान रहे हैं। हालांकि, यह कहानी एक बार फिर समाज की उस सोच को भी उजागर करती है, जहां बेटे को आज भी बेटियों से ज्यादा अहमियत दी जाती है।

