क्या अरब देवी मनात की प्रतिमा सोमनाथ मंदिर में थी? इतिहासकारों ने सदियों पुरानी कहानी को बताया मिथक
सोमनाथ मंदिर पर महमूद गजनवी के हमले से जुड़ी एक सदियों पुरानी कहानी एक बार फिर चर्चा में है। लंबे समय से यह दावा किया जाता रहा है कि अरब की देवी मनात की प्रतिमा सोमनाथ मंदिर में स्थापित थी और महमूद गजनवी ने उसी प्रतिमा को नष्ट करने के लिए मंदिर पर हमला किया था। हालांकि, आधुनिक इतिहासकारों और शोधकर्ताओं के अनुसार यह कहानी ऐतिहासिक तथ्यों पर नहीं, बल्कि एक गढ़े गए मिथक पर आधारित है।
इतिहास के जानकारों का कहना है कि भारतीय स्रोतों या पुरातात्विक साक्ष्यों में कहीं भी इस बात की पुष्टि नहीं मिलती कि देवी मनात की कोई प्रतिमा कभी सोमनाथ मंदिर में मौजूद थी। न तो उस दौर के संस्कृत शिलालेखों में और न ही भारतीय साहित्यिक ग्रंथों में मनात देवी का सोमनाथ से कोई संबंध बताया गया है। इसके बावजूद यह कथा लंबे समय तक इतिहास की पुस्तकों और लोककथाओं में दोहराई जाती रही।
दरअसल, देवी मनात को इस्लाम-पूर्व अरब की प्रमुख देवियों में से एक माना जाता था, जिनकी पूजा खास तौर पर अरब प्रायद्वीप में की जाती थी। इतिहासकारों के अनुसार, मनात का भारत से या विशेष रूप से गुजरात के सोमनाथ क्षेत्र से कोई प्रत्यक्ष धार्मिक या सांस्कृतिक संबंध नहीं था। ऐसे में यह सवाल उठता है कि उनकी प्रतिमा सोमनाथ जैसे प्रसिद्ध हिंदू मंदिर में कैसे पहुंची।
आधुनिक इतिहासकारों का मानना है कि यह कहानी मुख्य रूप से मध्यकालीन फारसी और अरबी लेखनों से निकली, जिनका उद्देश्य महमूद गजनवी की छवि को एक कट्टर ‘जिहादी’ शासक के रूप में स्थापित करना था। कई विद्वानों का कहना है कि गजनवी के अभियानों को धार्मिक युद्ध के रूप में पेश करने के लिए इस तरह के प्रतीकात्मक आख्यान गढ़े गए, ताकि उसकी राजनीतिक और सैन्य कार्रवाइयों को धार्मिक वैधता दी जा सके।
इतिहासकार रोमिला थापर सहित कई अन्य विद्वानों ने अपने शोध में इस बात पर जोर दिया है कि सोमनाथ पर हमला मुख्य रूप से आर्थिक और राजनीतिक कारणों से किया गया था। उस समय सोमनाथ मंदिर एक अत्यंत समृद्ध धार्मिक केंद्र था, जहां अपार धन-संपत्ति मौजूद थी। ऐसे में गजनवी का उद्देश्य लूट और शक्ति प्रदर्शन था, न कि किसी अरब देवी की प्रतिमा को नष्ट करना।
पुरातात्विक साक्ष्य भी इस कथित कहानी का समर्थन नहीं करते। अब तक की खुदाइयों और अध्ययन में सोमनाथ मंदिर से जुड़ा ऐसा कोई प्रमाण सामने नहीं आया है, जो मनात देवी की उपस्थिति की पुष्टि करे। विशेषज्ञों का कहना है कि यदि वास्तव में कोई विदेशी देवी की प्रतिमा वहां स्थापित होती, तो उसके कुछ न कुछ संकेत जरूर मिलते।
आज के इतिहासकार इस पूरी कथा को एक राजनीतिक नैरेटिव मानते हैं, जिसे समय के साथ ऐतिहासिक तथ्य का रूप दे दिया गया। उनका कहना है कि इतिहास को समझने के लिए स्रोतों की आलोचनात्मक जांच जरूरी है, न कि परंपरागत कथाओं को बिना सवाल किए स्वीकार करना।
सोमनाथ मंदिर और महमूद गजनवी से जुड़ी यह बहस यह दिखाती है कि इतिहास केवल घटनाओं का संग्रह नहीं, बल्कि उनके पीछे के संदर्भ और उद्देश्यों को समझने की प्रक्रिया भी है। विशेषज्ञों के मुताबिक, मनात की प्रतिमा से जुड़ी कहानी इतिहास से ज्यादा मिथक के दायरे में आती है, जिसे अब नए शोध सिरे से परख रहे हैं।

