तीस हजारी कोर्ट ने राजेंद्र नगर जैन मंदिर विवाद में दायर याचिका को खारिज कर दिया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि याचिका गलत फोरम में दायर की गई थी और इसके साथ ही मुकदमे का मूल्यांकन भी सही ढंग से नहीं किया गया।
जिला न्यायाधीश ने अपने आदेश में यह भी उल्लेख किया कि विवादित मंदिर की भूमि विश्व अहिंसा संघ (Vishwa Ahimsa Sangh) को लीज पर दी गई है। अदालत ने यह निर्णय लेते हुए कहा कि भूमि के स्वामित्व और उपयोग के मामलों में लीज समझौते का पालन किया जाना आवश्यक है और इसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
अदालत के फैसले के बाद विवाद से जुड़े पक्षों ने राहत की सांस ली है। मंदिर समिति और विश्व अहिंसा संघ के प्रतिनिधियों का कहना है कि अदालत के आदेश से मंदिर के संचालन और भूमि के उपयोग में स्पष्टता और स्थिरता आएगी। उन्होंने कहा कि यह निर्णय विवाद को विधिक रूप से सुलझाने में मददगार साबित होगा।
वकीलों का कहना है कि याचिका खारिज होने का मुख्य कारण यह था कि संबंधित मुद्दा तीस हजारी कोर्ट के अधिकार क्षेत्र से बाहर था। अदालत ने स्पष्ट किया कि इस प्रकार के विवाद में सटीक फोरम और सही प्रक्रियाओं का पालन करना आवश्यक है, ताकि मामला सही तरीके से सुना और निपटाया जा सके।
विशेषज्ञों का मानना है कि धार्मिक संपत्तियों और मंदिरों की भूमि को लेकर ऐसे विवाद आम हैं, लेकिन अदालत का यह आदेश यह संकेत देता है कि लीज और स्वामित्व समझौतों का पालन अनिवार्य है। उन्होंने कहा कि इससे भविष्य में धार्मिक संस्थानों के बीच भूमि विवादों के समाधान में मार्गदर्शन मिलेगा।
मंदिर परिसर के आसपास के स्थानीय लोग भी अदालत के निर्णय से संतुष्ट हैं। उनका कहना है कि इससे मंदिर के सुरक्षित और नियमित संचालन में मदद मिलेगी और विवाद से उत्पन्न होने वाली अराजकता कम होगी।
तीस हजारी कोर्ट के इस आदेश से यह संदेश भी गया है कि धार्मिक संस्थाओं और नागरिकों को कानूनी प्रक्रिया का पालन करना चाहिए और विवादों को सही मंच पर उठाना चाहिए। कोर्ट ने यह भी साफ किया कि भूमि और संपत्ति के मामलों में लीज, स्वामित्व और अनुबंध नियमों का सम्मान करना कानूनी दायित्व है।

