सुप्रीम कोर्ट का चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति पर सवाल, वीडियो मेें बोले जब फैसला सरकार ही लेगी, फिर कमेटी में नेता विपक्ष को रखने का दिखावा क्यों
सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति प्रक्रिया को लेकर केंद्र सरकार से सख्त सवाल किए। अदालत ने इस प्रक्रिया में स्वतंत्रता और पारदर्शिता को लेकर गंभीर चिंता जताते हुए कहा कि यदि अंतिम निर्णय पूरी तरह कार्यपालिका के हाथों में ही रहता है, तो चयन समिति में नेता प्रतिपक्ष को शामिल करने का औचित्य क्या है।
सुनवाई के दौरान अदालत ने केंद्र सरकार की ओर से पेश अटॉर्नी जनरल आर. वेंकटरमणी से सवाल किया कि यदि प्रधानमंत्री एक नाम चुनते हैं और विपक्ष का नेता दूसरा नाम सुझाता है, और दोनों के बीच सहमति नहीं बनती, तो क्या स्थिति में तीसरा सदस्य विपक्ष के पक्ष में जाएगा? इस पर अटॉर्नी जनरल ने स्वीकार किया कि ऐसी संभावना कम ही होती है।
इस जवाब पर सुप्रीम कोर्ट ने टिप्पणी करते हुए कहा कि यदि निर्णय प्रक्रिया में वास्तविक संतुलन नहीं है और अंतिम नियंत्रण कार्यपालिका के पास ही रहता है, तो फिर चयन समिति में विपक्ष के नेता को शामिल करने का क्या अर्थ रह जाता है। अदालत ने इसे “केवल औपचारिकता” और “दिखावटी व्यवस्था” जैसा बताते हुए सवाल उठाया कि लोकतांत्रिक संस्थाओं की स्वतंत्रता सुनिश्चित करने के लिए वास्तविक शक्ति-संतुलन जरूरी है या केवल नाममात्र की भागीदारी।
अदालत की यह टिप्पणी चुनाव आयोग जैसे संवैधानिक संस्थान की नियुक्ति प्रक्रिया की पारदर्शिता और निष्पक्षता को लेकर चल रही बहस को और तेज करती है। याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि चुनाव आयोग जैसे महत्वपूर्ण संस्थान की स्वतंत्रता बनाए रखने के लिए नियुक्ति प्रक्रिया को कार्यपालिका के प्रभाव से मुक्त होना चाहिए।
वहीं केंद्र सरकार का पक्ष रहा है कि मौजूदा व्यवस्था संविधान और कानून के दायरे में है और इसमें सभी आवश्यक संतुलन बनाए गए हैं। सरकार का यह भी कहना है कि चयन प्रक्रिया में विभिन्न स्तरों पर विचार-विमर्श किया जाता है ताकि योग्य उम्मीदवारों का चयन सुनिश्चित किया जा सके।
हालांकि सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी से यह स्पष्ट है कि अदालत इस व्यवस्था के व्यावहारिक प्रभावों और वास्तविक स्वतंत्रता पर गंभीर सवाल उठा रही है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह मामला भविष्य में चुनाव आयोग की नियुक्ति प्रणाली में बड़े बदलाव की दिशा में अहम भूमिका निभा सकता है।
फिलहाल इस मामले की सुनवाई जारी है और देश की निगाहें इस पर टिकी हैं कि सर्वोच्च न्यायालय इस संवैधानिक मुद्दे पर क्या अंतिम रुख अपनाता है।

