हाईकोर्ट ने 14 हफ्ते के गर्भपात पर महिला को बरी किया, कहा– गर्भावस्था जारी करने के लिए मजबूर करना उसका अधिकारों का उल्लंघन
हाल ही में हाईकोर्ट ने एक महिला को बरी करते हुए ऐतिहासिक फैसला सुनाया है, जिसमें चौदह हफ्ते की गर्भावस्था पर पति द्वारा दर्ज आपराधिक मामले में महिला की रक्षा की गई। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि किसी महिला को उसकी इच्छा के विरुद्ध गर्भावस्था जारी करने के लिए मजबूर करना उसके शरीर पर हक और व्यक्तिगत अधिकार का उल्लंघन है।
मामले की पृष्ठभूमि के अनुसार, महिला और उसके पति के बीच वैवाहिक कलह चल रही थी। विवाद के बीच पति ने गर्भपात कराने के निर्णय को लेकर महिला के खिलाफ शिकायत दर्ज कर दी। पति का दावा था कि महिला ने बिना उसकी सहमति के गर्भपात कराया। इसके बाद महिला को आपराधिक मुकदमे का सामना करना पड़ा।
कोर्ट ने महिलाओं के अधिकारों पर जोर दिया
हाईकोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि विवाह के भीतर वैवाहिक कलह और असहमति की स्थिति में भी महिला को गर्भपात का निर्णय लेने का पूरा अधिकार है। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि महिला का शरीर और उसके स्वास्थ्य से जुड़े फैसले पूरी तरह उसकी स्वतंत्र इच्छा पर आधारित होने चाहिए।
कोर्ट ने अपने आदेश में कहा, “किसी महिला को उसकी इच्छा के विरुद्ध गर्भावस्था जारी करने के लिए मजबूर करना उसके संstitutional और मानवाधिकारों का उल्लंघन है। वैवाहिक विवाद इसे प्रभावित नहीं कर सकता। महिला गर्भपात के फैसले में स्वतंत्र है और इसके लिए किसी की अनुमति या दबाव आवश्यक नहीं है।”
मामले का कानूनी महत्व
यह फैसला महिलाओं के स्वास्थ्य और शरीर पर अधिकार के दृष्टिकोण से काफी महत्वपूर्ण माना जा रहा है। विशेषज्ञों का कहना है कि यह आदेश महिलाओं को उनकी प्रजनन स्वतंत्रता और व्यक्तिगत निर्णय के अधिकार को मजबूत करता है। इससे यह संदेश भी जाता है कि वैवाहिक कलह के बावजूद महिला के शरीर और स्वास्थ्य पर कोई बाहरी दबाव नहीं चल सकता।
कानूनी जानकारों ने बताया कि पिछले कुछ वर्षों में महिलाओं के अधिकारों को लेकर कई महत्वपूर्ण फैसले आए हैं। हाईकोर्ट का यह निर्णय उन निर्णयों की श्रृंखला में शामिल है, जो महिलाओं को उनके शरीर, स्वास्थ्य और गर्भावस्था से जुड़े फैसलों में स्वतंत्रता प्रदान करते हैं।
सामाजिक और मानसिक दृष्टिकोण
इस फैसले को समाज में महिलाओं के अधिकारों के प्रति जागरूकता बढ़ाने वाला कदम माना जा रहा है। कई विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसे आदेश महिलाओं को मानसिक दबाव और डर के बिना अपने स्वास्थ्य से जुड़े फैसले लेने का साहस देते हैं।
कोर्ट ने महिला को बरी करने के साथ ही यह भी कहा कि उसके खिलाफ दर्ज शिकायत अवैध और असंगत थी। कोर्ट ने कहा कि महिलाएं वैवाहिक कलह या असहमति के बावजूद अपने शरीर और स्वास्थ्य के निर्णय में पूरी तरह स्वतंत्र हैं।

