दिल्ली विश्वविद्यालय में एक महीने के विरोध-प्रतिबंध पर हाई कोर्ट सख्त, प्रशासन से मांगा जवाब
दिल्ली हाई कोर्ट ने दिल्ली विश्वविद्यालय परिसर में एक महीने के लिए विरोध प्रदर्शनों पर लगाए गए प्रतिबंध को चुनौती देने वाली याचिका पर संबंधित पक्षों से जवाब तलब किया है। अदालत ने विश्वविद्यालय प्रशासन को नोटिस जारी करते हुए निर्देश दिया है कि वह अपने फैसले का विस्तृत औचित्य स्पष्ट करे।
याचिकाकर्ताओं की ओर से दायर अर्जी में कहा गया है कि विरोध-प्रदर्शनों पर पूर्ण प्रतिबंध लगाना छात्रों के मौलिक अधिकारों का उल्लंघन है। संविधान के तहत शांतिपूर्ण ढंग से अपनी बात रखने और असहमति जताने का अधिकार सभी नागरिकों को प्राप्त है, जिसमें छात्र समुदाय भी शामिल है। याचिका में तर्क दिया गया कि विश्वविद्यालय परिसर लोकतांत्रिक विमर्श का केंद्र होता है, ऐसे में एकमुश्त प्रतिबंध अनुचित और असंतुलित कदम है।
सुनवाई के दौरान अदालत ने कहा कि किसी भी संस्थान को कानून-व्यवस्था बनाए रखने का अधिकार है, लेकिन यह अधिकार पूर्ण नहीं है। यदि प्रशासन ने सुरक्षा या अन्य कारणों से यह निर्णय लिया है, तो उसे उसके ठोस आधार प्रस्तुत करने होंगे। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि प्रतिबंध की आवश्यकता, अवधि और परिस्थितियों की न्यायिक समीक्षा की जाएगी।
याचिका में यह भी उल्लेख किया गया कि विश्वविद्यालय प्रशासन ने बिना व्यापक परामर्श या पर्याप्त कारण बताए विरोध प्रदर्शनों पर रोक लगा दी। छात्रों का कहना है कि यह निर्णय अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को सीमित करता है और कैंपस में संवाद की परंपरा को प्रभावित करता है।
दूसरी ओर, विश्वविद्यालय प्रशासन का प्रारंभिक पक्ष यह बताया जा रहा है कि परिसर में शैक्षणिक माहौल और सुरक्षा व्यवस्था को बनाए रखने के लिए अस्थायी कदम उठाया गया। प्रशासन का कहना है कि हाल के घटनाक्रमों को देखते हुए यह फैसला एहतियातन लिया गया है।
अदालत ने संबंधित प्राधिकारियों को निर्धारित समय सीमा के भीतर अपना जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया है। साथ ही यह भी कहा कि मामले की अगली सुनवाई में सभी पक्षों की दलीलों पर विस्तार से विचार किया जाएगा।
कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार, यह मामला संस्थागत अनुशासन और संवैधानिक अधिकारों के बीच संतुलन से जुड़ा है। अदालत का अंतिम निर्णय भविष्य में विश्वविद्यालय परिसरों में विरोध-प्रदर्शनों के स्वरूप और सीमाओं को लेकर महत्वपूर्ण मिसाल साबित हो सकता है।
अब सबकी निगाहें अगली सुनवाई पर टिकी हैं, जहां हाई कोर्ट यह तय करेगा कि एक महीने का यह प्रतिबंध न्यायसंगत है या इसे संशोधित करने की आवश्यकता है।

