Samachar Nama
×

दिल्ली हाईकोर्ट का बड़ा फैसला: अवैध निर्माण के खिलाफ हर कोई नहीं दाखिल कर सकता याचिका, पड़ोसी का अधिकार माना

दिल्ली हाईकोर्ट का बड़ा फैसला: अवैध निर्माण के खिलाफ हर कोई नहीं दाखिल कर सकता याचिका, पड़ोसी का अधिकार माना

दिल्ली हाईकोर्ट ने अवैध निर्माण से जुड़े एक मामले में महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए स्पष्ट किया है कि केवल सामान्य असुविधा का हवाला देकर कोई भी व्यक्ति अदालत में याचिका दायर नहीं कर सकता। अदालत ने कहा कि अवैध निर्माण के खिलाफ कानूनी चुनौती देने वाले व्यक्ति का मामले से प्रत्यक्ष और वास्तविक संबंध होना जरूरी है। पड़ोसी होने की स्थिति में याचिकाकर्ता के अधिकार और हित सीधे प्रभावित हो सकते हैं, इसलिए ऐसे मामलों में उसकी याचिका पर विचार किया जा सकता है।

केवल असुविधा का तर्क पर्याप्त नहीं

हाईकोर्ट ने कहा कि सिर्फ यह कहना कि किसी निर्माण से लोगों को असुविधा हो रही है, अपने आप में अदालत का दरवाजा खटखटाने के लिए पर्याप्त आधार नहीं हो सकता। याचिका दायर करने वाले व्यक्ति को यह बताना होगा कि कथित अवैध निर्माण से उसके किसी कानूनी अधिकार या हित पर किस तरह प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है।

अदालत ने इस तरह की याचिकाओं में याचिकाकर्ता की स्थिति और उसके प्रत्यक्ष हित को महत्वपूर्ण माना। यानी किसी निर्माण को केवल अवैध बताकर कोई भी व्यक्ति अदालत में जाकर कार्रवाई की मांग नहीं कर सकता।

पड़ोसी क्यों कर सकता है याचिका?

अदालत के अनुसार, पड़ोसी का मामला दूसरे लोगों की तुलना में अलग हो सकता है। यदि किसी इमारत या संपत्ति में अवैध निर्माण किया जाता है और उसका सीधा असर आसपास रहने वाले व्यक्ति के अधिकारों, संपत्ति या उपयोग पर पड़ता है, तो पड़ोसी अदालत के समक्ष अपनी शिकायत रख सकता है।

उदाहरण के तौर पर अवैध निर्माण से किसी पड़ोसी की संपत्ति की सुरक्षा, रोशनी, हवा, पहुंच या अन्य कानूनी हित प्रभावित होते हैं तो उसके पास न्यायिक उपाय तलाशने का आधार हो सकता है।

अदालतों में याचिकाओं की सीमा भी जरूरी

हाईकोर्ट की इस टिप्पणी को न्यायिक प्रक्रिया के दुरुपयोग को रोकने के नजरिए से भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है। यदि किसी भी व्यक्ति को केवल सामान्य असुविधा के आधार पर अवैध निर्माण के खिलाफ याचिका दाखिल करने की अनुमति मिल जाए तो इससे अदालतों में अनावश्यक मुकदमों की संख्या बढ़ सकती है।

अदालत ने संकेत दिया कि न्यायिक हस्तक्षेप की मांग करने वाले व्यक्ति को अपने अधिकार और मामले से संबंध को स्पष्ट करना चाहिए। केवल सार्वजनिक असुविधा या सामान्य शिकायत का उल्लेख पर्याप्त नहीं होगा।

अवैध निर्माण पर कार्रवाई का अधिकार बरकरार

हालांकि हाईकोर्ट की टिप्पणी का यह मतलब नहीं है कि अवैध निर्माण के खिलाफ कार्रवाई नहीं हो सकती। संबंधित नगर निकाय और सरकारी एजेंसियां अपने अधिकार क्षेत्र में अवैध निर्माण की जांच और उस पर कार्रवाई कर सकती हैं।

फैसले का मुख्य पहलू यह है कि अदालत में निजी याचिका दायर करने वाले व्यक्ति की लोकस यानी मामले में कानूनी हैसियत और प्रत्यक्ष हित महत्वपूर्ण होंगे। इस तरह अदालत ने अवैध निर्माण से जुड़े मामलों में याचिकाकर्ता की पात्रता को लेकर स्थिति स्पष्ट करने की कोशिश की है।

इस फैसले से भविष्य में अवैध निर्माण के खिलाफ दायर होने वाली याचिकाओं में यह जांच अहम हो सकती है कि याचिकाकर्ता वास्तव में प्रभावित पक्ष है या केवल सामान्य असुविधा का हवाला देकर अदालत पहुंचा है।

Share this story

Tags