एम्स शोध: वायु प्रदूषण के सूक्ष्म कण गर्भस्थ शिशुओं के विकास को प्रभावित कर रहे हैं
अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) के एक नए अध्ययन में यह चौंकाने वाला तथ्य सामने आया है कि वायु प्रदूषण के सूक्ष्म कण (PM2.5 और PM10) गर्भ में पल रहे शिशुओं तक पहुंच रहे हैं और उनके विकास पर प्रतिकूल प्रभाव डाल रहे हैं।
शोध में पाया गया कि जिन गर्भवती महिलाओं को प्रदूषण वाले क्षेत्रों में रहना पड़ता है, उनके शिशुओं का जन्म कम वजन और समयपूर्व जन्म (preterm birth) के जोखिम के साथ होता है। अध्ययन के अनुसार, इन सूक्ष्म कणों में भारी धातुएं और रसायन होते हैं, जो मां के रक्त प्रवाह के माध्यम से भ्रूण तक पहुंच सकते हैं।
एम्स के शोधकर्ताओं ने 1,200 गर्भवती महिलाओं का तीन साल तक अध्ययन किया। उन्होंने पाया कि प्रदूषण स्तर जितना अधिक, शिशुओं का जन्म वजन उतना ही कम और जन्म समय पूर्व होने की संभावना अधिक होती है। शोध में यह भी संकेत मिला कि लगातार उच्च प्रदूषण में रहने वाली महिलाओं के बच्चों में स्नायु और मानसिक विकास पर दीर्घकालिक प्रभाव भी देखने को मिल सकता है।
अध्ययन के प्रमुख शोधकर्ता ने बताया, “हमारा शोध दर्शाता है कि वायु प्रदूषण केवल वयस्कों के स्वास्थ्य के लिए ही नहीं, बल्कि गर्भस्थ शिशुओं के विकास के लिए भी गंभीर खतरा है। यह नवजात शिशुओं के शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य को प्रभावित कर सकता है।”
विशेषज्ञों का कहना है कि शहरी क्षेत्रों में वायु प्रदूषण से बचाव के लिए गर्भवती महिलाओं को साफ-सुथरे वातावरण, मास्क का उपयोग, और प्रदूषण वाले क्षेत्रों में कम समय बिताने की सलाह दी जानी चाहिए। इसके अलावा सरकार और नगर निगम को प्रदूषण नियंत्रण के उपायों को और तेज करने की जरूरत है।
एम्स का यह अध्ययन देश में वायु प्रदूषण के स्वास्थ्य पर पड़ने वाले व्यापक प्रभावों को उजागर करता है। शोधकर्ता उम्मीद कर रहे हैं कि इस पर आधारित नीतिगत सुझावों से गर्भवती महिलाओं और शिशुओं की सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके।
इस शोध से एक बार फिर यह स्पष्ट हो गया है कि वायु प्रदूषण केवल सांस की बीमारियों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह नवजात शिशुओं के जीवन और विकास के लिए भी गंभीर खतरा बन गया है।

