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दिल्ली की दरगाह में 700 साल पुरानी सूफ़ी परंपरा और ज्ञान की देवी का पर्व

दिल्ली की दरगाह में 700 साल पुरानी सूफ़ी परंपरा और ज्ञान की देवी का पर्व

जैसे ही बसंत पंचमी आती है, पूरे देश में पीले रंग की छटा बिखर जाती है। सरसों के खेतों में पीले फूल खिलते हैं, गेंदे की मालाओं से घर सजते हैं और ऋतु का स्वागत रंग-बिरंगे उत्साह के साथ किया जाता है। यही दिन ज्ञान की देवी, मां सरस्वती की विशेष पूजा का भी पर्व माना जाता है।

देशभर में बच्चे इस दिन विद्या आरंभ करते हैं, घरों में खिचड़ी बनाई जाती है और माता-पिता संतान के लिए ज्ञान, विवेक और मधुर वाणी की कामना करते हैं। यह पर्व न केवल ऋतु परिवर्तन का प्रतीक है, बल्कि जीवन में सकारात्मक ऊर्जा और नई शुरुआत का संदेश भी देता है।

दिल्ली में बसंत पंचमी का उत्सव कुछ अलग ही रूप लेता है। हज़रत निज़ामुद्दीन औलिया की दरगाह, जो शहर के दिल में बसी है, इस दिन 700 साल पुरानी सूफ़ी परंपरा के अनुसार सजती और जीवंत होती है। यहां हर साल हजारों भक्त और श्रद्धालु बसंत पंचमी के अवसर पर आते हैं। दरगाह में इस दिन क़व्वाली और भक्ति संगीत का आयोजन होता है, जो रूहानी माहौल बनाता है और लोगों को आध्यात्मिक अनुभव से जोड़ता है।

स्थानीय लोग बताते हैं कि दरगाह पर बसंत पंचमी का उत्सव सिर्फ एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं है, बल्कि यह सांस्कृतिक और आध्यात्मिक समागम है, जो लोगों को प्रेम, सद्भाव और भक्ति की भावना से जोड़ता है। भक्तगण पीले कपड़े पहनकर, फूल और गुलाल चढ़ाकर, सूफ़ी क़व्वालियों की ताल पर झूमते हैं।

विशेषज्ञों का कहना है कि इस पर्व में सूफ़ी और वैदिक परंपरा का संगम देखने को मिलता है। जबकि माता-पिता अपने बच्चों की पढ़ाई और ज्ञान की कामना करते हैं, दरगाह में लोग आध्यात्मिक शांति और प्रेम की अनुभूति पाते हैं। यही वजह है कि हज़रत निज़ामुद्दीन औलिया की दरगाह हर साल बसंत पंचमी पर भक्तों से गूंज उठती है।

कुल मिलाकर, बसंत पंचमी न केवल ऋतु का परिवर्तन और माता सरस्वती की पूजा का प्रतीक है, बल्कि दिल्ली की दरगाह में यह 700 साल पुरानी सूफ़ी परंपरा के रूप में भी हर साल लोगों को आध्यात्मिक ऊर्जा और सांस्कृतिक अनुभव से जोड़ती है। यह पर्व याद दिलाता है कि ज्ञान, भक्ति और प्रेम के माध्यम से जीवन में सकारात्मक बदलाव और आत्मिक शांति लाई जा सकती है।

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