अंधविश्वास की कीमत: बीमार महिला को गांव से बाहर झोपड़ी में छोड़ा, गंभीर घावों के बावजूद नहीं मिला इलाज
छत्तीसगढ़ के गरियाबंद जिले से अंधविश्वास और सामाजिक उपेक्षा की एक दर्दनाक घटना सामने आई है। यहां एक बीमार महिला को बीमारी को छूत का रोग मानकर गांव से बाहर खेत में बनी एक झोपड़ी में छोड़ दिया गया। महिला के हाथ-पैरों में गंभीर घाव होने के बावजूद उसे समय पर इलाज नहीं मिला।
बताया जा रहा है कि महिला लंबे समय से बीमारी से जूझ रही थी। उसके शरीर पर गंभीर घाव हो गए थे, लेकिन गांव के लोगों ने इसे संक्रामक बीमारी मान लिया। इसी अंधविश्वास के चलते उसे गांव से अलग खेत में बनी झोपड़ी में रहने के लिए मजबूर कर दिया गया।
अंधविश्वास के चलते नहीं मिला इलाज
परिजनों और ग्रामीणों ने महिला को अस्पताल ले जाने के बजाय उसे समाज से अलग-थलग कर दिया। बीमारी के बारे में सही जानकारी और चिकित्सकीय सलाह लेने के बजाय अंधविश्वास पर भरोसा किया गया, जिससे उसकी हालत लगातार बिगड़ती गई।
स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि किसी भी बीमारी का इलाज केवल चिकित्सकीय जांच और डॉक्टर की सलाह से ही संभव है। बिना पुष्टि के किसी बीमारी को छूत का रोग मान लेना खतरनाक साबित हो सकता है।
प्रशासन और स्वास्थ्य विभाग की भूमिका पर सवाल
घटना सामने आने के बाद स्थानीय प्रशासन और स्वास्थ्य विभाग की कार्यप्रणाली पर भी सवाल उठ रहे हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में स्वास्थ्य सेवाओं की पहुंच और लोगों के बीच जागरूकता की कमी ऐसी घटनाओं को बढ़ावा देती है।
विशेषज्ञों का मानना है कि समय पर इलाज और सही जानकारी मिलने पर कई गंभीर बीमारियों का उपचार संभव है।
जागरूकता की जरूरत
यह घटना एक बार फिर साबित करती है कि आज भी कई ग्रामीण इलाकों में अंधविश्वास लोगों की जान पर भारी पड़ रहा है। सामाजिक जागरूकता, स्वास्थ्य शिक्षा और समय पर चिकित्सा सुविधा उपलब्ध कराना ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए बेहद जरूरी है।
फिलहाल, मामले की जानकारी मिलने के बाद संबंधित विभाग स्थिति की जांच में जुटे हैं। उम्मीद की जा रही है कि महिला को उचित इलाज उपलब्ध कराया जाएगा और ग्रामीणों को अंधविश्वास के बजाय वैज्ञानिक सोच अपनाने के लिए जागरूक किया जाएगा।

