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 Ambikapur  राष्ट्रपति के दत्तक पुत्र पंडो के अस्तित्व को खतरा

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 छत्तीसगढ़ न्यूज़ डेस्क  बलरामपुर जिले के रामचंद्रपुर इलाके में चार महीने में विशेष सरकारी योजनाओं में प्राथमिकता के अलावा पंडो विकास अभिकरण के जरिए करोड़ों रुपए इनके नाम खर्च हुए और अब तक होते आ रहे हैं संरक्षित पंडो जनजाति के 20 लोगों की मौत ने समाज को जहां झकझोर दिया है  वहीं इनके संरक्षण और कल्याण के लिए चलाई जा रही योजनाएं और सरकारी प्रयासों पर सवाल खड़े हो गए हैं। , लेकिन इन गांवों में रहने वालों के हालात बद से बदतर हैं। समाज का एक बड़ा वर्ग अब भी जीवन की जरूरतों के लिए जूझ रहा है और इस संघर्ष में उनकी जान जा रही है। बरवाही, दोलंगी, त्रिशूली और कुर्लाडीह, सिलाजू, पीपरपान, पलगी, झारा, आनंदपुर में जिन लोगों की मौत हुई है, उसके पीछे गरीबी, अंधविश्वास कुपोषण जैसे बड़े कारण सामने आ रहे हैं। काम नहीं मिलने से वे पलायन कर रहे हैं।

वहीं बीमार पड़ने पर अस्पताल न जाकर जड़ी-बूटी से इलाज और झाड़फूंक करा रहे हैं। उसे जादू-टोना किया है, इसलिए दवा काम नहीं करेगी। इस चक्कर मे उनका दम निकल जा रहा है। लोगों की जेहन में यह बात कूट-कूटकर भर गई है कि जो बीमार हो रहे हैं,  इसके पीछे का रीजन कहीं न कहीं फेल सिस्टम और कल्याणकारी योजनाओं का इन तक नहीं पहुंचना है। खाद्यान योजना को ही लें तो एक रुपए किलो चावल का किसी का कार्ड नहीं हैं, तो कइयों के कार्ड गिरवी हैं। एक महिला ने 12 हजार में अपना राशन कार्ड इसलिए गिरवी रखा था, क्योंकि उसने सास के अंतिम संस्कार के लिए 12 हजार कर्ज लिए थे, जबकि उसका खुद का परिवार राशन जुगाड़ कर और कंद मूल खाकर पेट भर रहा था।

यह तस्वीर बदलनी चाहिए नहीं तो पंडो इसी तरह मरते रहेंगे? कुर्लाडीह का एक युवक बीमार पिता के इलाज और बाद में मौत के बाद अपनी गिरवी रखी जमीन को छुड़ाने मजदूरी करने केरल गया था। उसकी 5 एकड़ जमीन 30 हजार में गिरवी है। इसके साथ परिवार के 7 सदस्यों का पेट चलाने का बोझ भी था। केरल से 8 माह बाद उसने 20 हजार घर भेजा। कुछ माह बाद खुद घर आने वाला था। परिवार खुश था कि अब उनकी जमीन छूट जाएगी, लेकिन घर में खुशी नहीं मातम पसरा।

एम्बुलेंस से जब उसका शव उतारा तो उसकी बेटियां अनजान थीं कि उनके सिर से पिता का साया हमेशा के लिए उठ गया है। वे पिता के शव को हिलाकर बार-बार कह रही थीं, दाऊ उठ न। यह देख पूरा गांव रो रहा था। बेटियां पिता के बारे पूछ रहीं हैं तो किसी को जवाब देते नहीं बन रहा है। हर मौत के पीछे यही दर्द है, लेकिन जिम्मेदारों को यह सब नहीं दिख रहा है। यह तस्वीर बदलनी चाहिए, नहीं तो पंडो इसी तरह मरते रहेंगे 1952 में राष्ट्रपति ने लिया था गोद पंडो जनजाति को राष्ट्रपति का दत्तक पुत्र कहा जाता है। देश के पहले राष्ट्रपति राजेन्द्र प्रसाद 1952 में सरगुजा आए थे, तब उन्होंने पंडो जनजाति की हालत को देखते हुए गोद लिया था।


इसकी रिपोर्ट सरकार को देंगे पंडो समाज के प्रदेश अध्यक्ष उदय पंडो के अनुसार समाज में अशिक्षा के कारण बीमार पड़ने पर झाड़-फूंक, जड़ी-बूटी से इलाज कराने में विश्वास कर रहे हैं। जागरूक नहीं होने के कारण उनका जाति प्रमाण-पत्र नहीं बन पता। इससे पढ़ाई-लिखाई, छात्रवृत्ति से लेकर नौकरी तक से वंचित हो रहे हैं। पण्डो परिवार को सबसे पहले शिक्षा से जोड़ा जाए। शिक्षा से जुड़ेंगे तो स्वत: अंधविश्वास समाप्त हो जाएगा। अनुसूचित जनजाति आयोग के अध्यक्ष भानु प्रताप सिंह ने कहा कि पंडो जनजाति में जनजागरूकता का अभाव है। मां के पेट से लेकर मृत्युपर्यंत तक योजनाएं चल रही हैं, फिर भी इलाज की बजाय कोई झाड़-फूंक और जड़ी-बूटी खाएं, तो इसे क्या कहेंगे? कुपोषण की बात सामने आ रही है। गांव में बांटे पोषण आहार को अलग-अलग लैब में भेज रहा हूं। पानी सहित कई समस्याएं हैं

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