जीविका से जुड़कर महिलाओं ने बदली तस्वीर, गया के टनकुप्पा में जैविक खेती बनी सफलता की मिसाल
बिहार के गया जिले के टनकुप्पा प्रखंड की महिलाओं ने सामूहिक प्रयास और आत्मविश्वास के बल पर जैविक खेती के क्षेत्र में एक नई मिसाल कायम की है। जीविका ग्राम संगठन से जुड़कर इन महिलाओं ने न केवल अपनी आर्थिक स्थिति को मजबूत किया है, बल्कि पूरे क्षेत्र को राज्य स्तर पर नई पहचान भी दिलाई है।
पहले सीमित संसाधनों और पारंपरिक खेती पर निर्भर रहने वाली ये महिलाएं आज जैविक कृषि के माध्यम से आत्मनिर्भरता की ओर बढ़ रही हैं। जीविका ग्राम संगठन के सहयोग से उन्हें प्रशिक्षण, तकनीकी जानकारी और बाजार से जुड़ने के अवसर मिले, जिससे खेती का स्वरूप पूरी तरह बदल गया।
महिलाओं ने रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों के बजाय जैविक खाद और प्राकृतिक तरीकों को अपनाकर खेती शुरू की। इसका परिणाम यह रहा कि उत्पादन की गुणवत्ता बेहतर हुई और बाजार में जैविक उत्पादों की मांग बढ़ने से उनकी आय में भी उल्लेखनीय वृद्धि हुई।
टनकुप्पा क्षेत्र में महिलाओं द्वारा उगाई जा रही जैविक सब्जियां और अन्य कृषि उत्पाद अब स्थानीय बाजारों के साथ-साथ आसपास के क्षेत्रों में भी पहचान बना रहे हैं। इससे न केवल परिवारों की आमदनी बढ़ी है, बल्कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था को भी मजबूती मिली है।
महिलाओं का कहना है कि जीविका समूह से जुड़ने के बाद उन्हें वित्तीय सहायता, प्रशिक्षण और सामूहिक रूप से काम करने का अवसर मिला। इससे उनका आत्मविश्वास बढ़ा और वे खेती को व्यवसाय के रूप में विकसित करने में सफल रहीं।
विशेषज्ञों के अनुसार, जैविक खेती पर्यावरण संरक्षण के साथ-साथ किसानों की आय बढ़ाने का प्रभावी माध्यम बन रही है। टनकुप्पा की महिलाओं की यह पहल अन्य ग्रामीण क्षेत्रों के लिए भी प्रेरणा का स्रोत है।
राज्य स्तर पर भी इस मॉडल की सराहना की जा रही है। अधिकारियों का मानना है कि महिलाओं के नेतृत्व में विकसित यह जैविक खेती मॉडल ग्रामीण विकास और महिला सशक्तिकरण का उत्कृष्ट उदाहरण है।
आज टनकुप्पा की महिलाएं साबित कर रही हैं कि यदि सही मार्गदर्शन, संसाधन और सामूहिक प्रयास मिल जाएं तो ग्रामीण क्षेत्रों में भी विकास और आत्मनिर्भरता की नई कहानी लिखी जा सकती है। उनकी सफलता ने न केवल क्षेत्र की पहचान बढ़ाई है, बल्कि अन्य महिलाओं को भी आगे बढ़ने की प्रेरणा दी है।

