बिहार की राजधानी पटना में विटामिन डी की कमी एक गंभीर और चिंताजनक स्वास्थ्य संकट का रूप लेती जा रही है। विशेषज्ञों के अनुसार, यह समस्या अब एक ‘साइलेंट हेल्थ इमरजेंसी’ बन चुकी है, क्योंकि शहर की करीब 82 प्रतिशत आबादी किसी न किसी स्तर पर विटामिन डी की कमी से जूझ रही है। सबसे चिंता की बात यह है कि इसके शुरुआती लक्षण आसानी से सामने नहीं आते, जिससे लोग लंबे समय तक अनजान रहते हैं।
स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि पटना में लगातार छाए रहने वाले घने कोहरे, वायु प्रदूषण और बदलती जीवनशैली के कारण लोगों को पर्याप्त धूप नहीं मिल पा रही है। धूप विटामिन डी का सबसे बड़ा प्राकृतिक स्रोत मानी जाती है, लेकिन सुबह और शाम के समय सूर्य की किरणें जमीन तक सही ढंग से नहीं पहुंच पा रही हैं। इसका सीधा असर बच्चों, बुजुर्गों और महिलाओं पर अधिक देखा जा रहा है।
डॉक्टरों के अनुसार, विटामिन डी की कमी के शुरुआती लक्षण सामान्य थकान, शरीर में दर्द, मांसपेशियों की कमजोरी और बार-बार बीमार पड़ना हो सकते हैं। लेकिन समय के साथ यह समस्या हड्डियों की कमजोरी, फ्रैक्चर, जोड़ों के दर्द, मानसिक तनाव, डिप्रेशन और रोग प्रतिरोधक क्षमता में कमी का कारण बन सकती है। कई मामलों में बच्चों में हड्डियों का सही विकास नहीं हो पाता, जबकि बुजुर्गों में गिरने से हड्डी टूटने का खतरा बढ़ जाता है।
पटना के हड्डी रोग विशेषज्ञों और फिजिशियनों का कहना है कि हाल के महीनों में फ्रैक्चर और मांसपेशियों से जुड़ी बीमारियों के मामलों में तेजी से वृद्धि हुई है। जांच कराने पर अधिकांश मरीजों में विटामिन डी का स्तर सामान्य से काफी कम पाया जा रहा है। विशेषज्ञ इसे आने वाले समय में एक बड़े सार्वजनिक स्वास्थ्य संकट के रूप में देख रहे हैं।
महिलाओं में यह समस्या और भी गंभीर है। गर्भवती महिलाएं और गृहिणियां अक्सर घर के अंदर ही अधिक समय बिताती हैं, जिससे उन्हें पर्याप्त धूप नहीं मिल पाती। इसके अलावा बच्चों में मोबाइल और ऑनलाइन पढ़ाई के बढ़ते चलन ने उन्हें भी घर तक सीमित कर दिया है।

