खगड़िया के दियारा क्षेत्र में विकास की बड़ी कमी, बागमती नदी बनी ग्रामीणों की जान पर भारी बाधा
आजादी के सात दशक से अधिक समय बीत जाने के बावजूद बिहार के कई इलाकों में बुनियादी सुविधाओं का अभाव आज भी लोगों की जान जोखिम में डाल रहा है। ऐसा ही एक चिंताजनक मामला खगड़िया जिले के अलौली प्रखंड से सामने आया है, जहां दियारा क्षेत्र में रहने वाले हजारों ग्रामीणों के लिए बागमती नदी आज भी विकास की राह में सबसे बड़ी बाधा बनी हुई है।
मोहरा घाट, कोलवारा, शहरबन्नी सहित करीब एक दर्जन गांवों के लोगों के पास नदी पार करने के लिए कोई स्थायी और सुरक्षित साधन उपलब्ध नहीं है। इन गांवों के निवासी रोजमर्रा की जरूरतों, शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं के लिए बागमती नदी पार करने को मजबूर हैं। मजबूरी में लोग नावों या बांस से बने अस्थायी चचरी पुलों का सहारा लेते हैं, जो हर समय खतरे से खाली नहीं होते।
ग्रामीणों का कहना है कि बच्चों को स्कूल भेजना सबसे बड़ी चुनौती बन गया है। कई बार अभिभावक जान जोखिम में डालकर बच्चों को नदी पार कराते हैं। बरसात के मौसम में हालात और भी भयावह हो जाते हैं। जब बागमती नदी उफान पर होती है, तब नावों का संतुलन बिगड़ने का खतरा बना रहता है और चचरी पुल बह जाते हैं। ऐसे समय में गांवों का संपर्क पूरी तरह कट जाता है।
स्थानीय लोगों के अनुसार, बीमार मरीजों को अस्पताल पहुंचाना किसी जंग से कम नहीं होता। कई बार समय पर इलाज न मिल पाने के कारण जान जाने की घटनाएं भी हो चुकी हैं। गर्भवती महिलाओं, बुजुर्गों और गंभीर मरीजों के लिए यह स्थिति और अधिक भयावह हो जाती है। ग्रामीण बताते हैं कि एंबुलेंस जैसी बुनियादी सुविधा भी नदी पार नहीं कर पाती, जिससे मजबूरी में लोग कंधे या नाव के सहारे मरीजों को ले जाते हैं।
ग्रामीणों ने बताया कि वर्षों से वे पुल निर्माण की मांग करते आ रहे हैं। कई बार जनप्रतिनिधियों और प्रशासनिक अधिकारियों को आवेदन भी दिया गया, लेकिन अब तक ठोस पहल नहीं हो सकी है। हर चुनाव में पुल का वादा किया जाता है, लेकिन चुनाव खत्म होते ही यह मुद्दा फिर ठंडे बस्ते में चला जाता है।
विशेषज्ञों का मानना है कि दियारा क्षेत्र में पुल का निर्माण न केवल आवागमन को आसान बनाएगा, बल्कि शिक्षा, स्वास्थ्य और आर्थिक गतिविधियों को भी मजबूती देगा। इससे ग्रामीणों का जीवन स्तर सुधरेगा और क्षेत्र का विकास संभव हो सकेगा।
फिलहाल हालात यह हैं कि व्यवस्था की लाचारी के आगे ग्रामीण खुद को बेबस महसूस कर रहे हैं। जान जोखिम में डालकर नदी पार करना उनकी नियति बन चुका है। सवाल यह है कि क्या आजादी के इतने वर्षों बाद भी बागमती नदी पार करने के लिए लोगों को इसी तरह संघर्ष करना पड़ेगा, या फिर सरकार और प्रशासन इस गंभीर समस्या का स्थायी समाधान निकाल पाएंगे।
यह मामला न सिर्फ खगड़िया बल्कि पूरे राज्य के लिए एक आईना है, जो यह दिखाता है कि विकास के दावों के बीच आज भी कई गांव बुनियादी सुविधाओं से वंचित हैं।

