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कोर्ट में जमानत के लिए ‘किराए के बेलर’ का खेल? रेप-मर्डर जैसे मामलों के लिए तय रेट का दावा, जांच के घेरे में व्यवस्था

कोर्ट में जमानत के लिए ‘किराए के बेलर’ का खेल? रेप-मर्डर जैसे मामलों के लिए तय रेट का दावा, जांच के घेरे में व्यवस्था

“कोर्ट में बेल करवानी है? महिला चाहिए या पुरुष, नया बेलर चाहिए या पुराना…जैसा चाहिए वैसा मिल जाएगा। बस रेट अलग-अलग होंगे।” मध्य प्रदेश की न्याय व्यवस्था से जुड़ा एक ऐसा दावा सामने आया है, जिसने जमानत प्रक्रिया को लेकर कई सवाल खड़े कर दिए हैं।

बताया जा रहा है कि कुछ लोग कोर्ट परिसर के आसपास जमानतदार (बेलर) उपलब्ध कराने का काम करते हैं। आरोप है कि जरूरत के हिसाब से महिला, पुरुष या पुराने जमानतदार उपलब्ध कराए जाते हैं और इसके लिए अलग-अलग रकम ली जाती है। गंभीर मामलों में भी जमानतदार उपलब्ध कराने के दावे किए जा रहे हैं।

सूत्रों के मुताबिक, ऐसे मामलों में कथित तौर पर रेट तय होने की बात सामने आई है। दावा किया जा रहा है कि रेप और मर्डर जैसे गंभीर अपराधों में एक बेलर के लिए करीब 1500 रुपये तक लिए जाते हैं। हालांकि, इस तरह के दावों की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है और पूरे मामले की जांच की जरूरत है।

जमानत प्रक्रिया पर उठे सवाल

कानून के अनुसार, जमानत के लिए अदालत में जमानतदार की भूमिका महत्वपूर्ण होती है। जमानतदार को आरोपी की पहचान, पता और अन्य जरूरी जानकारी की पुष्टि करनी होती है। ऐसे में यदि फर्जी या बिना सत्यापन वाले जमानतदार इस्तेमाल किए जाते हैं तो यह न्यायिक प्रक्रिया के लिए गंभीर चुनौती बन सकता है।

विशेषज्ञों का कहना है कि जमानतदार की व्यवस्था का उद्देश्य आरोपी की जिम्मेदारी तय करना होता है, न कि इसे किसी तरह के लेन-देन का माध्यम बनाना।

कोर्ट परिसरों में सक्रिय नेटवर्क की आशंका

अक्सर कोर्ट परिसरों में दस्तावेज तैयार करने वाले, टाइपिस्ट और अन्य सहायता देने वाले लोग मौजूद रहते हैं। ऐसे में कुछ लोगों द्वारा जमानतदार उपलब्ध कराने के नाम पर नेटवर्क चलाने की शिकायतें समय-समय पर सामने आती रही हैं।

यदि जमानतदारों की व्यवस्था में किसी तरह की अनियमितता पाई जाती है तो इससे गंभीर अपराधों में शामिल आरोपियों को भी गलत तरीके से राहत मिलने का खतरा बढ़ सकता है।

जांच की जरूरत

इस तरह के दावों के सामने आने के बाद कोर्ट प्रशासन और संबंधित एजेंसियों की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है। जमानत प्रक्रिया में पारदर्शिता बनाए रखने के लिए जमानतदारों के सत्यापन और रिकॉर्ड की जांच जरूरी है।

फिलहाल मामला चर्चा में है और सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या जमानतदार उपलब्ध कराने के नाम पर कोई संगठित व्यवस्था काम कर रही है या नहीं। इसकी वास्तविकता जांच के बाद ही साफ हो सकेगी।

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