भागलपुर में इंटरमीडिएट परीक्षा के पहले दिन छात्रों की परेशानियाँ और स्वागत का विरोधाभास
भागलपुर जिले में बिहार इंटरमीडिएट परीक्षा के पहले दिन कई छात्राओं को समय पर परीक्षा केंद्रों तक न पहुँच पाने के कारण परीक्षा से वंचित रहना पड़ा। यह घटना न केवल छात्राओं के लिए तनावपूर्ण रही, बल्कि उनके अभिभावकों में भी चिंता पैदा कर गई।
पुलिस और परीक्षा केंद्रों के अधिकारियों के अनुसार, सोनी कुमारी बच्चों की बीमारी के कारण केंद्र तक दो मिनट देरी से पहुँचीं, जबकि मनीषा कुमारी जाम में फंस गईं और समय पर प्रवेश नहीं कर सकीं। नियमों की सख्ती के चलते उन्हें परीक्षा में बैठने का अवसर नहीं मिला और इस वजह से उन्हें पूरे एक साल का नुकसान उठाना पड़ा। यह मामला शिक्षा व्यवस्था में नियमों की कड़ाई और छात्रों की वास्तविक परिस्थितियों के बीच की टकराहट को उजागर करता है।
परीक्षा अधिकारियों ने बताया कि इस बार सभी केंद्रों पर प्रवेश के लिए सख्त समय सीमा लागू की गई थी, ताकि परीक्षा निष्पक्ष और व्यवस्थित तरीके से आयोजित हो सके। नियमों के अनुसार, परीक्षा शुरू होने के बाद किसी भी छात्र को प्रवेश नहीं दिया जाएगा। अधिकारियों का कहना है कि यह कदम अनुशासन बनाए रखने और परीक्षा की अखंडता सुनिश्चित करने के लिए उठाया गया है।
हालांकि, कुछ केंद्रों पर छात्रों का फूलों से स्वागत किया गया और उन्हें मानसिक रूप से तैयार करने के प्रयास किए गए। इस तरह की पहल से परीक्षा का तनाव कम करने में मदद मिली, लेकिन उन छात्रों के लिए राहत का कोई उपाय नहीं था जो समय पर नहीं पहुँच सके। विशेषज्ञों का कहना है कि परीक्षा केंद्रों पर न सिर्फ नियमों की सख्ती, बल्कि छात्रों की परिस्थितियों को समझकर कुछ लचीलापन भी जरूरी होता है।
अभिभावकों ने इस पर अपनी चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि बच्चों की छोटी-छोटी परेशानियों के कारण उन्हें पूरे साल का नुकसान उठाना पड़ना अनुचित है। उन्होंने सुझाव दिया कि आपात परिस्थितियों में छात्रों को प्रवेश देने की कोई व्यवस्था होनी चाहिए।
छात्राओं का कहना है कि तैयारी के बावजूद समय पर पहुँच न पाने की वजह से परीक्षा से वंचित रहना बहुत दुखद अनुभव है। मनीषा कुमारी ने बताया कि जाम में फंस जाने के कारण उन्हें केंद्र तक पहुँचने में देर हुई और इसके कारण उनका एक साल गंवाना पड़ा। वहीं, सोनी कुमारी ने कहा कि बच्चों की बीमारी के कारण दो मिनट देरी हुई, लेकिन नियमों की सख्ती के चलते कोई छूट नहीं मिली।
विशेषज्ञों का मानना है कि परीक्षा का अनुशासन बनाए रखना आवश्यक है, लेकिन यह भी जरूरी है कि छात्रों के लिए वास्तविक परिस्थितियों में लचीलापन हो। यह न केवल छात्रों के मानसिक स्वास्थ्य के लिए अच्छा है, बल्कि शिक्षा व्यवस्था में विश्वास बनाए रखने के लिए भी जरूरी है।
भागलपुर में इस तरह की घटनाओं ने शिक्षा प्रशासन को यह सोचने पर मजबूर कर दिया है कि भविष्य में परीक्षा केंद्रों में नियमों और मानवता के बीच संतुलन कैसे बनाए रखा जा सकता है। छात्रों और अभिभावकों की आशंका है कि यदि लचीले नियम और आपात परिस्थितियों के लिए प्रावधान नहीं किया गया, तो कई छात्र बिना किसी गलती के महत्वपूर्ण अवसरों से वंचित हो सकते हैं।
इस परीक्षा दिवस की कहानी यह दिखाती है कि नियमों की कड़ाई और छात्रों की व्यक्तिगत परिस्थितियों के बीच संतुलन बनाए रखना शिक्षा प्रशासन की बड़ी चुनौती है।

