पटना में सड़क हादसे में घायल सॉफ्टवेयर इंजीनियर की जान बची, एम्स पटना के ट्रॉमा प्रमुख ने सड़क पर दिया जीवनरक्षक उपचार
बिहार की राजधानी पटना में मानवता और चिकित्सकीय जिम्मेदारी की एक मिसाल सामने आई है। दानापुर ओवरब्रिज के पास हुई एक सड़क दुर्घटना में गंभीर रूप से घायल सॉफ्टवेयर इंजीनियर चंद्र किशोर गुप्ता की जान एम्स पटना के ट्रॉमा प्रमुख डॉ. अनिल कुमार ने समय रहते बचा ली। यह घटना न केवल एक जीवन बचाने की कहानी है, बल्कि डॉक्टरों की सामाजिक जिम्मेदारी और मानवीय संवेदनाओं को भी दर्शाती है।
जानकारी के अनुसार, चंद्र किशोर गुप्ता दानापुर ओवरब्रिज के पास एक सड़क दुर्घटना में गंभीर रूप से घायल हो गए थे। हादसे के बाद वह सड़क पर अचेत अवस्था में पड़े थे और सांस लेने में कठिनाई हो रही थी। इसी दौरान संयोगवश वहां से गुजर रहे एम्स पटना के ट्रॉमा प्रमुख डॉ. अनिल कुमार भी मौके पर पहुंच गए।
बताया जा रहा है कि डॉ. अनिल कुमार अपने बेटे आदित्य के साथ वहां से गुजर रहे थे। बेटे ने जब सड़क पर घायल व्यक्ति की गंभीर हालत देखी तो अपने पिता से तुरंत मदद करने का आग्रह किया। इसके बाद डॉ. अनिल कुमार ने बिना समय गंवाए सड़क पर ही घायल को प्राथमिक उपचार देना शुरू किया।
डॉ. अनिल कुमार ने मौके पर ही मेडिकल क्षेत्र में प्रयुक्त ‘जॉ-थ्रस्ट’ तकनीक का इस्तेमाल किया। यह तकनीक विशेष रूप से ऐसे मरीजों के लिए उपयोगी होती है, जिनकी सांस की नली अवरुद्ध हो जाती है। इस तकनीक के जरिए उन्होंने घायल की सांस की नली को खुला रखा, जिससे ऑक्सीजन का प्रवाह बहाल हो सका। यह कदम चंद्र किशोर गुप्ता के लिए जीवनरक्षक साबित हुआ।
समय पर मिली इस प्राथमिक चिकित्सा के बाद घायल को तुरंत एम्स पटना ले जाया गया, जहां आगे का इलाज शुरू किया गया। डॉक्टरों के अनुसार, यदि कुछ मिनटों की भी देरी हो जाती तो स्थिति जानलेवा हो सकती थी। फिलहाल चंद्र किशोर गुप्ता खतरे से बाहर हैं और उनकी हालत में लगातार सुधार हो रहा है।
इस घटना के बाद गुप्ता के परिजनों ने डॉ. अनिल कुमार और उनके बेटे आदित्य का आभार जताया। उन्होंने कहा कि डॉ. अनिल ने न केवल एक डॉक्टर के रूप में, बल्कि एक संवेदनशील इंसान के रूप में भी अपना कर्तव्य निभाया।
चिकित्सा विशेषज्ञों का कहना है कि सड़क दुर्घटनाओं में घायल लोगों को समय पर प्राथमिक उपचार मिलना बेहद जरूरी होता है। कई बार अस्पताल पहुंचने से पहले ही सही तकनीक अपनाकर जान बचाई जा सकती है। डॉ. अनिल कुमार द्वारा दिया गया यह उपचार इसी का एक उत्कृष्ट उदाहरण है।
यह घटना समाज को यह संदेश देती है कि डॉक्टरों की जिम्मेदारी केवल अस्पताल तक सीमित नहीं होती। सही समय पर लिया गया एक निर्णय और मानवीय संवेदना किसी की जिंदगी बचा सकती है। पटना की यह घटना डॉक्टरों के पेशे की गरिमा और मानवता के महत्व को उजागर करती है।

