पत्नी को दूसरे पुरुष के साथ आपत्तिजनक स्थिति में देखना व्यभिचार का सबूत नहीं, पटना हाईकोर्ट ने खारिज की तलाक की अर्जी
पटना हाईकोर्ट ने तलाक से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले की सुनवाई करते हुए कहा है कि केवल पत्नी को किसी अन्य पुरुष के साथ कथित तौर पर 'आपत्तिजनक स्थिति' में देख लेना अपने आप में व्यभिचार साबित करने के लिए पर्याप्त नहीं है। अदालत ने स्पष्ट किया कि 'आपत्तिजनक स्थिति' और 'फिजिकल रिलेशन बनाना' दोनों अलग-अलग बातें हैं। महज परिस्थितियों के आधार पर वैवाहिक संबंध में व्यभिचार का निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता।
मामले की सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने इस बात पर जोर दिया कि व्यभिचार जैसे गंभीर आरोप को साबित करने के लिए पर्याप्त और विश्वसनीय साक्ष्य की जरूरत होती है। किसी व्यक्ति को दूसरे पुरुष के साथ आपत्तिजनक स्थिति में देखे जाने मात्र से यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि दोनों के बीच शारीरिक संबंध थे।
याचिका में पति की ओर से अपनी पत्नी के खिलाफ वैवाहिक संबंधों से जुड़े आरोप लगाए गए थे। पति का दावा था कि उसने पत्नी को किसी अन्य पुरुष के साथ कथित रूप से आपत्तिजनक स्थिति में देखा था। इसी आधार पर उसने वैवाहिक संबंधों को खत्म करने के लिए तलाक की मांग की थी। हालांकि, अदालत ने उपलब्ध तथ्यों और साक्ष्यों पर विचार करते हुए केवल इस आधार को व्यभिचार साबित करने के लिए पर्याप्त नहीं माना।
अदालत की टिप्पणी का मुख्य आधार यह रहा कि किसी व्यक्ति के साथ आपत्तिजनक स्थिति में पाया जाना और उसके साथ शारीरिक संबंध स्थापित करना एक ही बात नहीं है। दोनों के बीच महत्वपूर्ण अंतर है। यदि किसी व्यक्ति पर व्यभिचार का आरोप लगाया जाता है तो केवल संदेह या परिस्थिति के आधार पर उसे साबित नहीं माना जा सकता।
हाईकोर्ट ने इसी आधार पर तलाक की अर्जी को खारिज कर दिया। अदालत का यह फैसला वैवाहिक विवादों में लगाए जाने वाले आरोपों के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है। अदालत ने अप्रत्यक्ष रूप से यह स्पष्ट किया कि तलाक जैसे गंभीर कानूनी परिणाम के लिए आरोपों के समर्थन में ठोस आधार और विश्वसनीय साक्ष्य होना जरूरी है।
वैवाहिक मामलों में पति या पत्नी के चरित्र और कथित संबंधों से जुड़े आरोप बेहद संवेदनशील होते हैं। ऐसे मामलों में अदालत केवल आरोपों के आधार पर फैसला नहीं करती, बल्कि उपलब्ध साक्ष्यों और परिस्थितियों की कानूनी कसौटी पर जांच करती है। इसी प्रक्रिया के तहत इस मामले में भी अदालत ने कथित 'आपत्तिजनक पोजिशन' को व्यभिचार का निर्णायक प्रमाण नहीं माना।
फैसले से यह बात भी सामने आती है कि वैवाहिक विवाद में किसी तीसरे व्यक्ति की मौजूदगी या संदिग्ध परिस्थिति अपने आप में अवैध शारीरिक संबंध का प्रमाण नहीं बन जाती। इसके लिए आरोप लगाने वाले पक्ष को ऐसे तथ्य और साक्ष्य प्रस्तुत करने होते हैं, जिनसे आरोप कानूनी रूप से साबित हो सके।
पटना हाईकोर्ट की यह टिप्पणी ऐसे वैवाहिक विवादों में महत्वपूर्ण मानी जा सकती है, जहां पति या पत्नी की ओर से किसी अन्य व्यक्ति के साथ संबंधों का आरोप लगाया जाता है। अदालत ने साफ किया कि संदेह और प्रमाण के बीच अंतर होता है और केवल संदेह के आधार पर व्यभिचार साबित नहीं किया जा सकता।

