बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने 5 मार्च 2026 को राज्यसभा चुनाव के लिए अपना नामांकन पत्र दाखिल कर दिया, जिसके बाद राज्य की राजनीति में भूचाल आ गया है। यह नामांकन पटना में जमा करवाया गया और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह भी मौजूद रहे। इस दौरान बिहार के लिए राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) के अन्य उम्मीदवारों ने भी नामांकन दाखिल किया।
इस कदम के राजनीतिक असर ने बिहार की सियासी गलियों में बहस छेड़ दी है और विपक्ष तथा कुछ सहयोगी दलों के नेताओं ने कड़ी प्रतिक्रियाएँ दी हैं।
🔴 विपक्षी नेताओं की तीखी प्रतिक्रिया
आरजेडी के वरिष्ठ नेता मनोज झा ने इस कदम को भाजपा की “स्क्रिप्टेड रणनीति” बताकर गंभीर आलोचना की है। उनके अनुसार नीतीश कुमार के अचानक राज्यसभा के लिए नामांकन को केवल व्यक्तिगत इच्छा नहीं, बल्कि भाजपा की राजनीतिक चाल के तहत देखा जाना चाहिए — इसे उन्होंने दिल्ली में लिखी गई स्क्रिप्ट की तरह बताया।
वहीं, तेजस्वी यादव ने कहा कि यह भाजपा का अप्रत्याशित कदम है और भाजपा ने जेडीयू के नेतृत्व पर दबाव डालकर मुख्यमंत्री पद बदलने का प्रयास किया है। इसके साथ ही उन्होंने इस परिवर्तन को राजनीतिक अपहरण (हाइजैकिंग) जैसा बताया।
अन्य विपक्षी नेताओं ने भी आरोप लगाया कि नीतीश कुमार को उनके स्वयं के फैसले से हटाकर राज्यसभा भेजा जा रहा है, जिससे भाजपा को बिहार में शीर्ष स्थान पर काबिज होने का अवसर मिल सके। उन्होंने कहा कि यह जनादेश का अपमान है और मुख्यमंत्री पद से हटने की प्रक्रिया पर पूरी पारदर्शिता नहीं है।
🔵 जेडीयू कार्यकर्ताओं में नाराज़गी
नीतीश कुमार के इस फैसले से उनकी अपनी पार्टी जनतांत्रिक दल (यूनाइटेड) के कुछ कार्यकर्ता भी नाराज़ दिखे। पार्टी कार्यकर्ताओं ने पटना में निशानाकारी विरोध प्रदर्शन किए और कहा कि उन्होंने 2025 के विधानसभा चुनावों में “2025 से 2030 तक फिर से नीतीश” के नारे के साथ वोट दिया था, इसलिए यह बदलाव उनकी उम्मीद के खिलाफ है। कुछ कार्यकर्ताओं ने कहते हुए कहा कि यदि कोई बदलाव है, तो उनका बेटा निशांत कुमार ही मुख्यमंत्री पद का विकल्प हो सकता है।
🟡 राजनीतिक विश्लेषण: क्या है मायने?
नीतीश कुमार की राजनैतिक यात्रा एक महत्वपूर्ण मोड़ पर आ चुकी है। दशकों तक बिहार के मुख्यमंत्री रहे नीतीश कुमार अब राजसभा में जाने की दिशा में बढ़ रहे हैं, जिससे यह अनुमान लगाया जा रहा है कि भाजपा के नेतृत्व में बिहार में नई सरकार के गठन की सम्भावना भी बढ़ सकती है। राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि यह कदम एग्ज़िट प्लान जैसा लग रहा है, जिसे भाजपा और उसके सहयोगियों ने मिलकर आगे बढ़ाया है।

