जिले के मोहनपुर प्रखंड मुख्यालय से लगभग 15 किलोमीटर दूर, जंगल और पहाड़ों के बीच बसा मटगढ़ा गांव कभी माओवादी गतिविधियों का गढ़ माना जाता था। यहाँ के ग्रामीण लंबे समय तक हिंसा और डर के बीच जीते रहे। माओवादियों की उपस्थिति ने न केवल स्थानीय जीवन को प्रभावित किया, बल्कि शिक्षा, स्वास्थ्य और विकास की कई योजनाओं को भी बाधित किया।
स्थानीय लोगों का कहना है कि 2000 के दशक के मध्य तक मटगढ़ा में माओवादियों का असर इतना अधिक था कि प्रशासनिक और सरकारी सेवाएँ भी ग्रामीणों तक नहीं पहुँच पाती थीं। ग्रामीणों को रोजमर्रा की गतिविधियों में भी खतरे का सामना करना पड़ता था। छोटे बच्चों की पढ़ाई, महिलाओं की स्वतंत्रता और स्वास्थ्य सेवाओं की उपलब्धता पर भी इसका सीधा असर पड़ा।
हालांकि, पिछले कुछ वर्षों में स्थिति में धीरे-धीरे सुधार हुआ है। सुरक्षा बलों की कार्रवाई, स्थानीय प्रशासन की सतत निगरानी और ग्रामीणों की जागरूकता ने माओवादी गतिविधियों को काफी हद तक कम कर दिया है। अब मटगढ़ा गांव में जीवन धीरे-धीरे सामान्य होने लगा है और लोग विकास की नई उम्मीदें देखने लगे हैं।
विकास कार्यों की गति में वृद्धि होने से स्थानीय लोगों का भरोसा भी बढ़ा है। शिक्षा के क्षेत्र में सरकारी और गैर-सरकारी संस्थानों ने बच्चों के लिए कई पहल शुरू की हैं। पहले जहाँ विद्यालयों में पढ़ाई बाधित रहती थी, अब बच्चों को नियमित शिक्षा मिल रही है। स्वास्थ्य सेवाओं में सुधार हुआ है और सरकारी स्वास्थ्य केंद्रों तक ग्रामीणों की पहुँच सुनिश्चित की जा रही है।
सड़क और परिवहन के सुधार से मटगढ़ा गांव अब मुख्य बाजार और प्रखंड मुख्यालय से जुड़ गया है। इससे न केवल स्थानीय किसानों को अपने उत्पाद बेचने में सुविधा हुई है, बल्कि युवाओं के लिए रोजगार और व्यवसाय के नए अवसर भी खुल गए हैं। प्रशासन की योजना है कि आगे आने वाले वर्षों में गांव में और अधिक बुनियादी सुविधाओं का विकास किया जाए, ताकि ग्रामीणों का जीवन स्तर और बेहतर हो सके।
स्थानीय लोगों का कहना है कि मटगढ़ा में बदलाव का श्रेय सुरक्षा बलों और प्रशासन के साथ-साथ खुद ग्रामीणों की भागीदारी को भी जाता है। उन्होंने मिलकर माओवादियों के प्रभाव को कम किया और गांव को विकास की दिशा में अग्रसर किया। आज मटगढ़ा गांव का उदाहरण यह दिखाता है कि जब समाज, प्रशासन और सुरक्षा बल एक साथ काम करते हैं, तो किसी भी चुनौती का सामना किया जा सकता है।
विशेषज्ञों का कहना है कि मटगढ़ा जैसी जगहों पर स्थायी विकास तभी संभव है जब सुरक्षा, शिक्षा, स्वास्थ्य और आर्थिक अवसरों के बीच संतुलन बनाया जाए। यही कारण है कि वर्तमान में मटगढ़ा न केवल भयमुक्त हो रहा है, बल्कि यह धीरे-धीरे विकास और समृद्धि का प्रतीक बन रहा है।
इस बदलाव की कहानी न केवल मटगढ़ा बल्कि उस पूरे इलाके के लिए प्रेरणा है, जहाँ माओवादियों के खौफ ने लंबे समय तक लोगों की जिंदगी प्रभावित की थी। अब मटगढ़ा गांव अपनी नई पहचान के साथ आगे बढ़ रहा है और यह संदेश दे रहा है कि कठिन परिस्थितियों में भी विकास और सामूहिक प्रयास से उम्मीद की किरण जगी रह सकती है।

