बिहार की सियासत में मकर संक्रांति का खास महत्व, तेज प्रताप की एनडीए नेताओं से मुलाकात ने बढ़ाईं अटकलें
बिहार की राजनीति में मकर संक्रांति का एक खास राजनीतिक महत्व माना जाता है। राज्य में यह आम धारणा रही है कि मकर संक्रांति के बाद ही बड़े राजनीतिक फैसले, कार्यक्रम और बदलाव देखने को मिलते हैं। चाहे किसी बड़े नेता की राजनीतिक यात्रा हो, कैबिनेट विस्तार हो या फिर सत्ता समीकरणों में बदलाव—अक्सर इनकी शुरुआत मकर संक्रांति के बाद ही होती रही है।
राजनीतिक गलियारों में यह भी चर्चा आम है कि मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने अपने लंबे राजनीतिक करियर में कई बार मकर संक्रांति के बाद ही बड़ा राजनीतिक फैसला लिया है। सत्ता में रहते हुए उनकी ‘पलटी’ को लेकर विपक्ष अक्सर तंज कसता रहा है। ऐसे में मकर संक्रांति के आसपास होने वाली राजनीतिक गतिविधियों को बेहद गंभीरता से देखा जाता है।
इसी पृष्ठभूमि में हाल ही में तेज प्रताप यादव की एनडीए नेताओं से मुलाकात ने सियासी चर्चाओं को और हवा दे दी है। तेज प्रताप की यह मुलाकात ऐसे समय में सामने आई है, जब बिहार की राजनीति पहले से ही संभावित फेरबदल और गठबंधन की अटकलों से गर्म है। राजनीतिक विश्लेषक इसे सामान्य मुलाकात मानने को तैयार नहीं हैं और इसके पीछे गहरे सियासी संकेत तलाशे जा रहे हैं।
तेज प्रताप यादव राष्ट्रीय जनता दल (राजद) के प्रमुख नेता और पूर्व मंत्री रह चुके हैं। वह अक्सर अपने बयानों और गतिविधियों को लेकर चर्चा में रहते हैं। एनडीए नेताओं से उनकी मुलाकात को लेकर विपक्षी खेमे में हलचल है, वहीं एनडीए समर्थक इसे राजनीतिक शिष्टाचार बता रहे हैं।
बिहार की राजनीति में मकर संक्रांति को एक तरह का राजनीतिक टर्निंग पॉइंट माना जाता है। इसके पीछे यह तर्क दिया जाता है कि खरमास समाप्त होने के बाद राजनीतिक गतिविधियों में तेजी आती है। इसी दौरान नए फैसले, घोषणाएं और रणनीतियां सामने आती हैं। यही वजह है कि नेताओं की गतिविधियों पर पैनी नजर रखी जाती है।
राजनीतिक जानकारों का कहना है कि तेज प्रताप यादव की यह मुलाकात भले ही अभी किसी बड़े घटनाक्रम में न बदली हो, लेकिन बिहार की राजनीति में संदेश जरूर दे रही है। आने वाले समय में यदि सत्ता या विपक्ष में कोई बड़ा बदलाव होता है, तो इसकी पटकथा मकर संक्रांति के आसपास ही लिखी जा सकती है।
हालांकि राजद की ओर से फिलहाल इस मुलाकात को ज्यादा तवज्जो नहीं दी जा रही है। पार्टी नेताओं का कहना है कि इसे बेवजह तूल दिया जा रहा है। वहीं एनडीए की ओर से भी कोई स्पष्ट प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि बिहार की राजनीति में संकेत और समय दोनों बेहद अहम होते हैं। मकर संक्रांति के आसपास होने वाली हर गतिविधि को भविष्य की राजनीति से जोड़कर देखा जाता है। ऐसे में तेज प्रताप यादव की एनडीए नेताओं से मुलाकात को सिर्फ संयोग मानना मुश्किल हो रहा है।
अब सबकी निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि मकर संक्रांति के बाद बिहार की राजनीति में क्या कोई नया मोड़ आता है या फिर यह सारी चर्चाएं केवल राजनीतिक कयास बनकर रह जाती हैं। आने वाले दिनों में यह साफ हो जाएगा कि यह मुलाकात महज औपचारिक थी या किसी बड़े सियासी बदलाव की आहट।

