बिजली कंपनी से हाईकोर्ट का सवाल- पेंशन दी तो नौकरी क्यों रोकी? गोद लिए पुत्र को भी अनुकंपा नियुक्ति का अधिकार
अनुकंपा नियुक्ति से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में हाईकोर्ट ने बड़ा फैसला सुनाया है। अदालत ने कहा है कि यदि किसी कर्मचारी के गोद लिए हुए पुत्र को परिवार का सदस्य माना जाता है और उसे अन्य अधिकार प्राप्त हैं, तो उसे अनुकंपा नियुक्ति के अधिकार से वंचित नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने बिजली कंपनी से सवाल किया कि जब गोद लिए गए पुत्र को पेंशन का लाभ दिया गया, तो फिर नौकरी देने से इनकार क्यों किया गया।
मामला बिजली कंपनी में कार्यरत एक कर्मचारी की मृत्यु के बाद उसके परिवार से जुड़ा है। कर्मचारी की मृत्यु के बाद उसके आश्रित ने अनुकंपा के आधार पर नौकरी के लिए आवेदन किया था। कंपनी की ओर से आवेदन पर आपत्ति जताई गई और गोद लिए पुत्र को अनुकंपा नियुक्ति देने से इनकार कर दिया गया।
इसके बाद मामला हाईकोर्ट पहुंचा। सुनवाई के दौरान अदालत ने बिजली कंपनी की दलीलों पर सवाल उठाए। कोर्ट ने पूछा कि यदि संबंधित व्यक्ति को कर्मचारी के परिवार का हिस्सा मानते हुए पेंशन सहित अन्य लाभ दिए गए हैं, तो अनुकंपा नियुक्ति के मामले में अलग व्यवहार क्यों किया जा रहा है।
समान अधिकार का दिया हवाला
हाईकोर्ट ने अपने फैसले में परिवार के अधिकारों और समानता के सिद्धांत पर जोर दिया। अदालत ने कहा कि किसी व्यक्ति को एक ही आधार पर कुछ लाभ देना और उसी आधार पर किसी अन्य वैधानिक अधिकार से वंचित करना उचित नहीं हो सकता।
कोर्ट ने माना कि गोद लिया हुआ पुत्र भी परिवार का अभिन्न हिस्सा होता है। यदि कानूनी रूप से गोद लेने की प्रक्रिया पूरी है और उसे परिवार के सदस्य के तौर पर स्वीकार किया गया है, तो अनुकंपा नियुक्ति के अधिकार पर भी विचार किया जाना चाहिए।
बिजली कंपनी को पुनर्विचार के निर्देश
मामले की सुनवाई के बाद हाईकोर्ट ने बिजली कंपनी को अपने निर्णय पर पुनर्विचार करने का निर्देश दिया है। अदालत ने कहा कि संबंधित मामले में नियमों और तथ्यों को ध्यान में रखते हुए उचित निर्णय लिया जाए।
हाईकोर्ट के इस फैसले को उन परिवारों के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है, जहां कर्मचारियों की मृत्यु के बाद गोद लिए हुए बच्चों को अनुकंपा नियुक्ति को लेकर परेशानी का सामना करना पड़ता है।
अनुकंपा नियुक्ति का उद्देश्य
अनुकंपा नियुक्ति का उद्देश्य सरकारी या सार्वजनिक संस्थानों में कार्यरत कर्मचारी की मृत्यु के बाद उसके आश्रित परिवार को आर्थिक सहारा देना होता है। यह नियुक्ति सामान्य भर्ती प्रक्रिया से अलग होती है और परिवार की आर्थिक स्थिति को देखते हुए दी जाती है।
कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार, इस तरह के मामलों में सबसे अहम बात यह होती है कि आवेदक का मृत कर्मचारी के साथ कानूनी और पारिवारिक संबंध किस रूप में स्थापित है।
हाईकोर्ट के इस फैसले के बाद अब ऐसे मामलों में गोद लिए हुए पुत्रों के अधिकारों को लेकर नई दिशा मिलने की उम्मीद है। अदालत के आदेश ने यह स्पष्ट संकेत दिया है कि परिवार के अधिकार तय करते समय केवल रिश्ते का नाम नहीं, बल्कि कानूनी स्थिति और व्यवहार में मिले अधिकारों को भी ध्यान में रखा जाना चाहिए।

