बिहार में 25 लाख रुपये देकर छोड़ दी डॉक्टर की नौकरी, सरकार को क्यों देने पड़े पैसे?
बिहार में सरकारी स्वास्थ्य सेवा से डॉक्टरों के इस्तीफे के मामले सामने आने के बाद अनिवार्य सेवा बॉन्ड की व्यवस्था एक बार फिर चर्चा में आ गई है। हाल ही में राज्य सरकार ने चार डॉक्टरों के त्यागपत्र स्वीकार किए हैं। इनमें एक डॉक्टर ने अनिवार्य सरकारी सेवा पूरी करने के बजाय 25 लाख रुपये की बॉन्ड राशि जमा कर सेवा से अलग होने का विकल्प चुना है।
एक डॉक्टर ने 25 लाख रुपये देकर छोड़ी नौकरी
गया के अनुग्रह नारायण मगध मेडिकल कॉलेज एवं अस्पताल में तैनात सामान्य चिकित्सा पदाधिकारी डॉ. अंजली कुमारी ने तीन साल की अनिवार्य सरकारी सेवा पूरी नहीं की। इसके बदले उन्होंने निर्धारित 25 लाख रुपये की बॉन्ड राशि जमा की और सरकारी सेवा से इस्तीफा दे दिया। उनके त्यागपत्र को मंजूरी दे दी गई है।
बिहार में सरकारी मेडिकल कॉलेजों से पीजी करने वाले डॉक्टरों के लिए पढ़ाई पूरी करने के बाद राज्य सरकार के अधीन तीन साल की सेवा की शर्त लागू है। निर्धारित अवधि तक सेवा नहीं देने पर डॉक्टर को बॉन्ड के तहत राशि का भुगतान करना पड़ता है।
तीन अन्य डॉक्टरों के इस्तीफे भी मंजूर
सरकार ने तीन अन्य चिकित्सकों के त्यागपत्र भी स्वीकार किए हैं। इनमें जहानाबाद सदर अस्पताल के विशेषज्ञ चिकित्सा पदाधिकारी डॉ. अभय कुमार, औरंगाबाद के अतिरिक्त प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र चौहट्टा की चिकित्सा पदाधिकारी डॉ. अन्नुप्रिया और हाजीपुर सदर अस्पताल की विशेषज्ञ चिकित्सा पदाधिकारी डॉ. तलत फातिमा शामिल हैं।
रिपोर्ट के मुताबिक डॉ. अभय कुमार का चयन पटना में असिस्टेंट प्रोफेसर के पद पर हुआ था। वहीं डॉ. अन्नुप्रिया का चयन केंद्र सरकार की सेवा में हुआ। डॉ. तलत फातिमा ने व्यक्तिगत कारणों का हवाला देते हुए इस्तीफा दिया था।
क्या है बिहार का मेडिकल बॉन्ड?
बिहार सरकार की नीति के तहत सरकारी मेडिकल कॉलेजों से पोस्टग्रेजुएट कोर्स पूरा करने वाले डॉक्टरों को तीन साल तक राज्य की स्वास्थ्य सेवाओं में काम करना होता है। ऐसा नहीं करने पर 25 लाख रुपये की बॉन्ड राशि और प्रशिक्षण के दौरान प्राप्त वेतन या छात्रवृत्ति की राशि वापस करने का प्रावधान है।
प्रवेश के समय ही डॉक्टरों से बॉन्ड लिया जाता है। इसका उद्देश्य सरकारी संस्थानों से विशेषज्ञ चिकित्सा शिक्षा प्राप्त करने वाले डॉक्टरों की सेवाएं कुछ वर्षों तक सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था में सुनिश्चित करना है।
हाईकोर्ट भी बॉन्ड व्यवस्था पर दे चुका है फैसला
जनवरी 2026 में पटना हाईकोर्ट ने एक मामले में बिहार सरकार की तीन साल की अनिवार्य सेवा और 25 लाख रुपये के बॉन्ड प्रावधान को लागू करने को लेकर दायर याचिका खारिज कर दी थी। अदालत ने कहा था कि राज्य सरकार को मेडिकल बॉन्ड से संबंधित नीति बनाने का अधिकार है।
अदालत के रिकॉर्ड के मुताबिक, सुप्रीम कोर्ट ने भी सरकारी सहायता से मेडिकल शिक्षा लेने वाले डॉक्टरों के लिए उचित शर्तों के साथ अनिवार्य सेवा बॉन्ड को अपने आप में अनुचित नहीं माना है। साथ ही राज्यों में बॉन्ड की शर्तों में एकरूपता की जरूरत पर ध्यान दिलाया गया था।
विशेषज्ञ डॉक्टरों की कमी के बीच बढ़ी चर्चा
बिहार के सरकारी अस्पतालों में विशेषज्ञ डॉक्टरों की उपलब्धता बनाए रखना इस व्यवस्था का प्रमुख उद्देश्य है। हालांकि, हाल के इस्तीफों में कुछ डॉक्टरों के सामने बेहतर करियर अवसर, शिक्षण संस्थानों में नियुक्ति, केंद्र सरकार की सेवा या व्यक्तिगत कारण जैसे अलग-अलग विकल्प रहे हैं। ऐसे में डॉक्टरों के इस्तीफों ने एक बार फिर यह सवाल चर्चा में ला दिया है कि अनिवार्य सेवा बॉन्ड को किस तरह प्रभावी बनाया जाए, ताकि सरकारी स्वास्थ्य संस्थानों में विशेषज्ञ डॉक्टरों की उपलब्धता भी बनी रहे और डॉक्टरों के करियर विकल्पों को भी ध्यान में रखा जा सके।

