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दरभंगा राज की तिरहुत रेलवे: 62 दिनों में अकाल राहत पहुंचाने वाली ऐतिहासिक पहल

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बिहार के दरभंगा राज की ऐतिहासिक तिरहुत रेलवे ने 1873-74 के अकाल में जनता को राहत पहुंचाकर एक मिसाल कायम की। उस समय महाराजा लक्ष्मेश्वर सिंह ने केवल 62 दिनों में रेल लाइन बिछाकर अनाज दरभंगा तक पहुंचाया, जिससे लाखों लोगों की जान बचाई गई। यह घटना भारतीय रेलवे इतिहास में एक अद्वितीय उदाहरण के रूप में दर्ज है।

तिरहुत रेलवे अपने समय की तकनीकी उन्नति के लिए भी प्रसिद्ध थी। इसमें यात्रियों के लिए थर्ड क्लास में शौचालय की सुविधा दी गई थी, जो उस दौर में अत्यंत अनूठी बात थी। रेलवे में नरगौना टर्मिनल जैसे स्टेशनों ने इसे और भी विशेष बना दिया। यह केवल परिवहन का साधन नहीं था, बल्कि जनहितकारी सोच और आधुनिकता का प्रतीक भी था।

हालांकि, 1934 के भूकंप और प्रशासनिक उपेक्षा के कारण यह ऐतिहासिक विरासत धीरे-धीरे खत्म हो गई। रेल लाइन और उसके स्टेशनों की उपयोगिता धीरे-धीरे कम होती गई, लेकिन महाराजा लक्ष्मेश्वर सिंह की जनहितकारी पहल और दूरदर्शिता आज भी इतिहास में जीवित है।

विशेषज्ञों का कहना है कि तिरहुत रेलवे न केवल एक तकनीकी उपलब्धि थी, बल्कि सामाजिक और मानवीय दृष्टि से भी अभूतपूर्व थी। अकाल जैसी आपातकालीन परिस्थितियों में मात्र दो महीने में रेल लाइन बिछाकर राहत पहुंचाना आज भी प्रशासनिक और सामाजिक नेतृत्व के लिए प्रेरणा स्रोत है।

तिरहुत रेलवे का यह अध्याय यह दिखाता है कि साहस, त्वरित कार्रवाई और जनहित की सोच किसी भी चुनौती का सामना कर सकती है। भले ही भूकंप और उपेक्षा के चलते यह विरासत भौतिक रूप से नष्ट हो गई हो, लेकिन इसका संदेश और जनहित की भावना आज भी पीढ़ियों के लिए मार्गदर्शक बनी हुई है।

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