नालंदा:जानलेवा बीमारी का ऐसे अस्पताल में इलाज, जहां नहीं होता ऑपरेशन, आंख निकालने के बाद भी मौत का खतरा
बिहार में सिस्टम का संक्रमण ब्लैक फंगस से ज्यादा खतरनाक हो गया है। यह संक्रमितों की जान से खेल रहा है। न दवा, न ऑपरेशन, संक्रमण के बाद मौत मिल रही है। डॉक्टर ब्लैक फंगस के हर मरीज में ऑपरेशन की बात करते हैं, लेकिन यहां तो जान से खिलवाड़ हो रहा है। बिहार के सबसे बड़े अस्पताल पटना मेडिकल कॉलेज, जिसे सरकार विश्व स्तर का बनाने की तैयारी कर रही है, वहां ऐसा खेल हो रहा है। मरीज तो भर्ती किए जा रहे हैं, लेकिन ऑपरेशन के लिए रेफर का खेल चल रहा है। इस खेल में फंसे संक्रमितों की आंख निकालने के बाद भी जान नहीं बच रही है। बिहार में यह हाल तब है, जब नीति आयोग ने स्वास्थ्य व्यवस्था के मामले में पीठ थपथपाई है। 66 अंक देकर मध्य प्रदेश और यूपी से भी आगे रखा है।
बिहार सरकार के हेल्थ विभाग ने PMCH को ब्लैक फंगस के इलाज के लिए तैयार किया है। यहां ENT और नेत्र रोग विभाग को मिलाकर 70 बेड की व्यवस्था की गई। गंभीर बीमारी को लेकर पूरे देश में हाहाकार मचा है, लेकिन इसके बाद PMCH में ऑपरेशन की व्यवस्था नहीं है। यहां अब तक 63 संक्रमित भर्ती हो चुके हैं, जिनमें इलाज नहीं होने से आधा दर्जन से अधिक मरीज भाग गए हैं। मंगलवार तक PMCH में 31 संक्रमित भर्ती हैं। 90 प्रतिशत मरीजों का संक्रमण आंख तक पहुंच गया है और ऑपरेशन तक नहीं हुआ है। अब तक 5 संक्रमितों की मौत हो चुकी है। गंभीर मरीजों को भर्ती किया जाता है और फिर बाद में उन्हें ऑपरेशन के लिए रेफर किया जाता है। ऐसे में मरीजों के ऑपरेशन में देरी होने से मौत का खतरा बढ़ता जा रहा है।
पटना मेडिकल कॉलेज में मरीजों के रेफर करने से AIIMS और IGIMS में भीड़ बढ़ गई है। ऑपरेशन के लिए समस्या हो रही है। डॉक्टरों की भी कमी पड़ जा रही है। इस कारण रेफर मरीजों के ऑपरेशन में बड़ी बाधा आ रही है। AIIMS और IGIMS में मरीजों की पहले से भीड़ होती है। बेड की समस्या होती है और ऐसे में रेफर मरीजों की व्यवस्था करना चुनौती हो जाती है।
PMCH से पहले मरीजों को छुट्टी कर दी जा रही है और बाद में उन्हीं मरीजों को फिर से नए रजिस्ट्रेशन पर भर्ती किया जा रहा है। छुट्टी ऑपरेशन के लिए की जा रही है और AIIMS और IGIMS ऑपरेशन के लिए भेजा जा रहा है। इससे पटना मेडिकल कॉलेज मरीजों की छुट्टी दिखाता है, जिससे ठीक होकर जाने वाले मरीजों का आंकड़ा बढ़ जाए। फिर पुराने मरीजों को नए रजिस्ट्रेशन पर भर्ती करने से पुराने मरीज भी नए मरीज के रूप में भर्ती कर लिए जाते हैं। नीति आयोग का दावा है कि बिहार के हेल्थ सिस्टम में तेजी से सुधार हुआ है, लेकिन ब्लैक फंगस के मरीजों की जान से खिलवाड़ दावों की पोल खोलने के लिए काफी है। ब्लैक फंगस के मरीजों के लिए ऑपरेशन जरूरी है, लेकिन पटना मेडिकल कॉलेज में ऐसा नहीं हो रहा है। ऐसे दावों की पोल पटना मेडिकल कॉलेज के ब्लैक फंगस वार्ड से खुल रही है।ब्लैक फंगस का इलाज कर रहे डॉक्टरों का कहना है कि संक्रमण पहले नाक में होता और फिर साइनस में पहुंचता है इसके बाद आंख और फिर ब्रेन में पहुंचता है। अगर नाक में ही ब्लैक फंगस का ऑपरेशन कर उसे निकाल दिया जाए और फिर दवाएं दी जाएं तो खतरा कम हो जाता है। साइनस तक भी ऑपरेशन से ठीक किया जा सकता है, लेकिन आंख और ब्रेन में पहुंचने के बाद देरी हो जाती है। इससे मरीजों की आंख निकालने के बाद भी जान बचानी मुश्किल होती है। PMCH में ऐसे मरीजों की संख्या अधिक है, जिनका संक्रमण आंख तक पहुंच गया है और ऑपरेशन नहीं हो पा रहा है। पटना AIIMS में 15% संक्रमितों की आंख निकाल दी गई है और 40% का तालू काटकर निकाल दिया गया है। इसमें ऐसे मरीज अधिक हैं, जो संक्रमण होने के बाद अस्पताल देरी से पहुंचे हैं। इसमें कहीं से अस्पताल में देरी होती है तो कहीं मरीज के स्तर से देरी होती है। AIIMS के ENT की HOD डॉ क्रांति भावना बताती हैं ब्लैक फंगस में देरी होने से जान का खतरा बढ़ जाता है। संक्रमित हॉस्पिटल देर से ही आ रहे हैं।
IGIMS के मेडिकल सुपरिटेंडेंट डॉ मनीष मंडल का भी कहना है कि ऑपरेशन के स्टेज में देरी होने से जान का खतरा बढ़ जाता है। PMCH में हो रही मनमानी को लेकर अधीक्षक डॉ आई के ठाकुर से बात करने की कई बार कोशिश की गई, लेकिन बात नहीं किए। काफी प्रयास के बाद OSD ने फोन अटेंड किया और प्रेस की बात सुनते ही अधीक्षक के VC में होने की बात कह दी।

