पीएम मोदी की ‘बचत अपील’ का असर: एक्सक्लुसीव फुटेज में जानें 12 राज्यों में VVIP काफिलों से लेकर सरकारी कामकाज तक में बदलाव, खर्च घटाने की पहल तेज
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की हालिया ‘बचत और संसाधन संरक्षण’ की अपील का असर देश के कई राज्यों में तेजी से देखने को मिल रहा है। अब तक 12 राज्यों में सरकारी खर्च कम करने और ईंधन की बचत के लिए प्रशासनिक स्तर पर बड़े बदलाव किए गए हैं। इनमें वीवीआईपी काफिलों की गाड़ियों में कटौती से लेकर सरकारी कर्मचारियों के कामकाज के तरीके तक शामिल हैं।
त्रिपुरा सरकार ने इस दिशा में एक बड़ा निर्णय लेते हुए ग्रुप C और D श्रेणी के कर्मचारियों के लिए नया नियम लागू किया है। इसके तहत केवल 50 प्रतिशत कर्मचारी ही रोजाना कार्यालय आएंगे, जबकि बाकी कर्मचारियों को वर्क फ्रॉम होम की सुविधा दी जाएगी। सरकार का कहना है कि इससे न केवल कार्यालयों का खर्च कम होगा, बल्कि ईंधन और संसाधनों की भी बचत होगी।
आंध्र प्रदेश और गोवा में भी प्रशासनिक स्तर पर सख्त कदम उठाए गए हैं। आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू और गोवा के मुख्यमंत्री प्रमोद सावंत ने अपने-अपने वीवीआईपी काफिले में वाहनों की संख्या 50 प्रतिशत तक कम करने का निर्णय लिया है। दोनों राज्यों का मानना है कि इससे पेट्रोल की बचत के साथ-साथ सरकारी खर्च में भी कमी आएगी।
पंजाब में भी इसी तरह का कदम उठाया गया है, जहां राजभवन और प्रशासनिक स्तर पर यह निर्देश जारी किया गया है कि हर बुधवार को अधिकारी चार-पहिया वाहनों का उपयोग नहीं करेंगे। वहीं हरियाणा में मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी ने सप्ताह में एक दिन बिना सरकारी वाहन के यात्रा करने का निर्णय लिया है, जिसे प्रतीकात्मक रूप से ‘बचत दिवस’ के रूप में देखा जा रहा है।
इससे पहले दिल्ली, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, राजस्थान और बिहार जैसे राज्यों में भी वीवीआईपी काफिलों में वाहनों की संख्या कम करने का फैसला लिया जा चुका है। इन राज्यों में सुरक्षा और प्रशासनिक प्रोटोकॉल को ध्यान में रखते हुए काफिले को छोटा किया गया है, जिससे ईंधन की खपत में कमी आने की उम्मीद है।
सबसे खास बदलाव प्रधानमंत्री कार्यालय से जुड़े प्रोटोकॉल में भी देखने को मिला। बुधवार को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपने काफिले में सामान्य 12 से 15 वाहनों की बजाय केवल दो वाहनों के साथ यात्रा पर निकले। इसे प्रशासनिक स्तर पर एक संदेश के रूप में देखा जा रहा है कि उच्च पदों पर बैठे लोग भी बचत और सादगी को बढ़ावा दें।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यह अभियान लंबे समय तक जारी रहता है तो इससे न केवल सरकारी खर्च में बड़ी कटौती होगी, बल्कि पर्यावरण संरक्षण और ईंधन खपत में भी सकारात्मक बदलाव देखने को मिल सकता है। हालांकि, कुछ राजनीतिक और प्रशासनिक विश्लेषक इसे प्रतीकात्मक कदम भी मान रहे हैं, जिनका वास्तविक प्रभाव राज्यों के कार्यान्वयन और निगरानी पर निर्भर करेगा।
फिलहाल देशभर में इस पहल को लेकर चर्चा तेज है और कई राज्यों में इसे चरणबद्ध तरीके से लागू किया जा रहा है। यह देखना दिलचस्प होगा कि आने वाले समय में यह ‘बचत मॉडल’ कितना प्रभावी साबित होता है और क्या यह स्थायी नीति के रूप में विकसित होता है या नहीं।

