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भारत के शीतकालीन खेलों की सफलता में एचएडब्ल्यूएस की भूमिका रही अहम

गुलमर्ग, 1 मार्च (आईएएनएस)। जम्मू-कश्मीर के गुलमर्ग में छठे खेलो इंडिया विंटर खेलों का आयोजन हुआ। खिलाड़ियों का प्रदर्शन इस बार कमाल रहा। हालांकि, खिलाड़ियों ने कहा कि असली जीत पोडियम पर नहीं, बल्कि गुलमर्ग की बर्फीली चोटियों और हाई एल्टीट्यूड वारफेयर स्कूल (एचएडब्ल्यूएस) में मिली ट्रेनिंग में हुई।
भारत के शीतकालीन खेलों की सफलता में एचएडब्ल्यूएस की भूमिका रही अहम

गुलमर्ग, 1 मार्च (आईएएनएस)। जम्मू-कश्मीर के गुलमर्ग में छठे खेलो इंडिया विंटर खेलों का आयोजन हुआ। खिलाड़ियों का प्रदर्शन इस बार कमाल रहा। हालांकि, खिलाड़ियों ने कहा कि असली जीत पोडियम पर नहीं, बल्कि गुलमर्ग की बर्फीली चोटियों और हाई एल्टीट्यूड वारफेयर स्कूल (एचएडब्ल्यूएस) में मिली ट्रेनिंग में हुई।

भारत के विभिन्न राज्यों, सेना, सीआरपीएफ, और आईटीबीपी के खिलाड़ी मानते हैं कि उनकी सफलता का बड़ा कारण एचएडब्ल्यूएस है।

एचएडब्ल्यूएस की स्थापना दिसंबर 1948 में ब्रिगेडियर जनरल के. एस. थिमैया ने 19वीं इन्फैंट्री डिवीजन स्की स्कूल के रूप में की थी। बाद में यह विंटर वारफेयर स्कूल बना और 1962 में इसे ए कैटेगरी ट्रेनिंग का दर्जा मिला।

एचएडब्ल्यूएस ऊंचाई पर युद्ध और बर्फ में सर्वाइवल की ट्रेनिंग के लिए प्रसिद्ध है। अब इसके ढलानों पर सिर्फ सैनिक नहीं, बल्कि खिलाड़ी भी अभ्यास करते हैं।

शिलांग की 25 साल की काजल कुमारी राय ने 2024 से पहले कभी बर्फ नहीं देखी थी, लेकिन एचएडब्ल्यूएस में 15 दिन के प्रशिक्षण के बाद वह नॉर्डिक 15 किलोमीटर और 10 किलोमीटर स्प्रिंट की चैंपियन बन गईं। काजल ने कहा, "सीआरपीएफ में शामिल होने से मुझे दिशा मिली। एचएडब्ल्यूएस और सेना ने मुझे आत्मविश्वास दिया।" कर्नाटक की भवानी टी.एन. ने भी अपने खेल को एचएडब्ल्यूएस और इंडियन इंस्टिट्यूट ऑफ स्कीइंग एंड माउंटेनियरिंग (आईआईएसएम) से निखारा।

भवानी टीएन, जिन्होंने इस सीजन नॉर्डिक महिला की 1.5 स्प्रिंट में स्वर्ण पदक और 15 किलोमीटर और 10 किलोमीटर स्पर्धाओं में कांस्य पदक अपने नाम किया। 23 साल की भवानी ने इससे पहले बर्फ को छुआ भी नहीं था। हालांकि, इंडियन इंस्ट्यूट ऑफ स्कीइंग एंड माउंटेनियरिंग और एचएडब्ल्यूएस की मदद से वह शानदार प्रदर्शन करने में सफल रहीं।

पुरुषों की नॉर्डिक 10 किलोमीटर में सेना ने स्वर्ण, रजत और कांस्य पदक जीते। पद्मा नमगेल ने गोल्ड, अमन ने सिल्वर और मंजीत ने ब्रॉन्ज मेडल अपने नामकिया। 1.5 किलोमीटर स्प्रिंट में भी सेना का पदक तालिका में दबदबा रहा और सनी सिंह, शुभम परिहार और मंजीत ने दमदार प्रदर्शन किया। सभी खिलाड़ियों ने एचएडब्ल्यूएस को सिर्फ एक ट्रेनिंग सेंटर नहीं बल्कि सफलता का आधार बताया।

नमगेल ने कहा, "एचएडब्ल्यूएस सिर्फ आर्मी के ही नहीं, बल्कि दूसरी फोर्स और राज्यों के विंटर स्पोर्ट्स एथलीट्स को तैयार करने में भी बहुत बड़ी भूमिका निभाता है। फंडिंग, ट्रेनिंग, कोचिंग या कॉम्पिटिशन की कोई दिक्कत नहीं है। सबसे अच्छे एथलीट्स को यूरोप भी भेजा जाता है। ट्रैक टफ हैं, बर्फ सख्त है, लेकिन एचएडब्ल्यूएस की वजह से हम हमेशा तैयार रहते हैं।"

एचएडब्ल्यूएस में 250-300 सेना के एथलीट और पांच से 10 नागरिक खिलाड़ी हर साल ट्रेनिंग लेते हैं। यहां अल्पाइन स्की सिम्युलेटर, रोलर स्की, जिम्नेजियम और इंडोर स्पोर्ट्स कॉम्प्लेक्स जैसी सुविधाएं हैं। एचएडब्ल्यूएस में डाइट, फिटनेस और उपकरण भी अंतरराष्ट्रीय स्तर के हैं।

सीआरपीएफ के खिलाड़ी भी एचएडब्ल्यूएस से प्रशिक्षित होकर अब बेहतर प्रदर्शन कर रहे हैं। गुलमर्ग में पदक भले ही खिलाड़ियों के गले में हों, लेकिन असली सफलता का श्रेय एचएडब्ल्यूएस को जाता है, जहां चैंपियन खिलाड़ियों को तैयार किया जाता है।

--आईएएनएस

एसएम/डीकेपी

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