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एशियन गेम्स में पदक का रंग बदलना चाहती हूं: सीमा कालीरमन

नई दिल्ली, 28 अगस्त (आईएएनएस)। सीमा कालीरमन ने हाल ही में ग्लासगो में आयोजित कॉमनवेल्थ गेम्स 2026 में डिस्कस थ्रो में कांस्य पदक जीता था। कालीरमन का अगला लक्ष्य जापान में होने वाले एशियन गेम्स में पदक जीतना है और इस बार वह अपने पदक का रंग बदलना चाहती हैं।

नई दिल्ली, 28 अगस्त (आईएएनएस)। सीमा कालीरमन ने हाल ही में ग्लासगो में आयोजित कॉमनवेल्थ गेम्स 2026 में डिस्कस थ्रो में कांस्य पदक जीता था। कालीरमन का अगला लक्ष्य जापान में होने वाले एशियन गेम्स में पदक जीतना है और इस बार वह अपने पदक का रंग बदलना चाहती हैं।

सीमा कालीरमन सिर्फ एक डिस्कस थ्रो एथलीट नहीं हैं। आर्थराइटिस से जूझने के बाद खेल में वापसी, चार साल के बेटे से दूर रहने की भावना और पीएडी करते हुए कॉमनवेल्थ गेम्स में कांस्य पदक जीतने का उनका सफर काफी प्रेरणादायी रहा है।

आईएएनएस से खास बातचीत में सीमा ने कहा, "मेरा अगला फोकस एशियन गेम्स पर है। मैंने कॉमनवेल्थ गेम्स में कांस्य पदक जीता है। अब मेरा फोकस एशियन गेम्स में पदक का रंग बदलने पर है।"

उन्होंने कहा, "यह सफर आसान नहीं रहा। कॉमनवेल्थ गेम्स के दौरान भी मुश्किल थी। मेरा पहला थ्रो नेट से टकराने के बाद मैं बिल्कुल भी परेशान नहीं थी। मुझे पता था कि मेरे पास पांच थ्रो हैं। मेरा दूसरा थ्रो लगभग 57 मीटर तक गया, लेकिन मैंने खुद से कहा कि मेरे पास चार और थ्रो बाकी हैं और मुझे उनमें अपना बेस्ट देना है।"

सीमा पीएचडी कर रही हैं। उनके शोध का टाइटल भी 'एथलीटों के परफॉर्मेंस पर इमेजिनरी और पॉजिटिव सेल्फ-टॉक ट्रेनिंग का असर' है। उन्होंने कहा कि मेंटल टफनेस ने उन्हें तीसरे प्रयास में 58.65 मीटर का थ्रो करने में मदद की, जिससे आखिरकार उन्हें कांस्य पदक मिला।

उन्होंने कहा, "अगर मैं मानसिक रूप से तैयार नहीं होती, तो मैं अपने दूसरे थ्रो भी अच्छे से नहीं कर पाती। मेरी पीएचजी का टॉपिक 'एथलीटों की परफॉर्मेंस पर इमेजिनरी और पॉजिटिव सेल्फ-टॉक ट्रेनिंग का असर' है। मैं इसे खुद पर लागू कर रही हूं, और इससे मुझे अच्छे परिणाम मिले हैं, इसमें कॉमनवेल्थ भी शामिल है।"

सीमा को 2022 में अपने बच्चे के जन्म के बाद आर्थराइटिस की भी दिक्कत हुई। उन्हें स्टेरॉयड लेने की सलाह दी गई थी, लेकिन उनके पति, रविंदर, जो उनके कोच भी हैं, ने उन्हें अपनी मसल्स को ट्रेन करने की सलाह दी, इस उम्मीद में कि इससे उन्हें ठीक होने में मदद मिलेगी।

उन्होंने कहा, "आर्थराइटिस ने मुझे कमजोर बना दिया था। मेरा वजन 80-85 किग्रा से घटकर 50-55 किग्रा हो गया था। उस समय मेरे पति ने मेरा बहुत साथ दिया। डॉक्टर ने यह कहते हुए मुझे स्टेरॉयड लेने की सलाह दी कि 'हम इसे पूरी तरह ठीक नहीं कर सकते, सिर्फ मेंटेन कर सकते हैं। मेरे पति ने मुझसे कहा कि हम प्रैक्टिस और ट्रेनिंग करेंगे, जिससे मुझे मसल्स बनाने में मदद मिलेगी और इससे आर्थराइटिस का दर्द काफी कम हो सकता है। यह सच था, आर्थराइटिस का दर्द अब परमानेंट नहीं है। यह बस कभी-कभी होता है।"

सीमा मे कहा, "मेरे हाल के सिल्वर कॉन्टिनेंटल टूर के दौरान, मेरे हाथों और पैरों में सूजन आ गई थी। मुझे समझ नहीं आया कि मैंने ऐसा क्या खाया जिससे यह सूजन हो गई। 2-3 दिन बाद, मुझे पता चला कि मेरे हाथों में सूजन क्यों आई। तो मैंने वह छोड़ दिया, और कुछ दिनों बाद सूजन चली गई। इसलिए मुझे इस बात का ध्यान रखना पड़ता है कि क्या खाना है और क्या नहीं। आर्थराइटिस की दिक्कतें कभी-कभी आ जाती हैं। लेकिन अब सब ठीक है।"

उन्होंने कहा, "मुझे एक मां, अपनी पढ़ाई और अपने खेल के अलग-अलग रोल भी मैनेज करने पड़ते हैं। लेकिन, पढ़ाई कभी भी खेल में रुकावट नहीं बनी। शनिवार और रविवार को हमें आराम मिलता है, इसलिए मैं उन दिनों या दूसरे आराम के दिनों में अपनी पीएचडी पर काम करती हूं। मेरे परिवार ने मेरा बहुत सपोर्ट किया है। मेरे बेटे के दादा-दादी मेरे बेटे का ख्याल रखते हैं, इसलिए मुझे उनसे मदद मिलती है। ट्रेनिंग की वजह से मैं अपने बेटे से दूर रहती हूं। वह अपनी मां से मिलने के लिए भिवानी से पटियाला अपने दादा-दादी के साथ आता है। वह यहां 2-3 दिन रुकता है और फिर चला जाता है।"

सीमा ने कॉमनवेल्थ गेम्स में पदक का रंग बदलने की अपनी प्रतिबद्धता दोहराई।

--आईएएनएस

पीएके

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