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भगवान शिव कौन हैं? वीडियो में जानिए योग, तांडव और चेतना से जुड़े इस रहस्यमय देवता का पूर्ण परिचय 

भगवान शिव कौन हैं? वीडियो में जानिए योग, तांडव और चेतना से जुड़े इस रहस्यमय देवता का पूर्ण परिचय 

भारतवर्ष की धार्मिक परंपराओं में भगवान शिव एक अद्वितीय स्थान रखते हैं। त्रिदेवों में एक माने जाने वाले शिव न केवल एक देवता हैं, बल्कि वे एक दर्शन हैं – जीवन, मृत्यु और पुनर्जन्म की जटिलताओं को समझाने वाला एक सार्वभौमिक प्रतीक। लेकिन आज के बदलते दौर में यह सवाल बार-बार उठता है: आखिर भगवान शिव हैं कौन? क्या वे केवल एक धार्मिक अवधारणा हैं, या उनके पीछे कोई गहरी वैज्ञानिक और सांस्कृतिक चेतना भी छिपी है?

आध्यात्मिक स्वरूप: शिव – आदियोगी से महादेव तक
शिव को 'आदियोगी' कहा जाता है, यानी योग का पहला शिक्षक। योग के प्राचीन ग्रंथों में उल्लेख है कि शिव ने सप्तऋषियों को योग की सात शाखाएं सिखाईं, जिन्होंने इसे पूरे संसार में फैलाया। तांडव नृत्य के माध्यम से वे सृष्टि के निर्माण, पालन और संहार की प्रक्रिया का प्रतीक बन जाते हैं। वे कभी ध्यान में लीन योगी होते हैं, तो कभी रौद्र रूप में विनाश करते हैं।उनकी यह द्वैतपूर्ण छवि – शांत और उग्र – जीवन के संतुलन को दर्शाती है। शिव का नटराज रूप विज्ञान और कला दोनों का प्रतीक है। तमिलनाडु के चिदंबरम मंदिर में स्थित नटराज की मूर्ति को ‘कॉस्मिक डांस’ का प्रतिरूप माना जाता है, जिसे आधुनिक भौतिकशास्त्रियों ने भी ‘डांस ऑफ पार्टिकल्स’ से जोड़ा है।

सांस्कृतिक पहचान: लोक से जुड़ा देवता
शिव को भारत के कोने-कोने में पूजा जाता है – हिमालय की चोटियों से लेकर दक्षिण के मंदिरों तक। वे न तो किसी विशेष जाति या वर्ग के देवता हैं और न ही केवल वेदों तक सीमित हैं। द्रविड़, गोंड, संथाल और अन्य आदिवासी समुदायों में भी शिव के समान देवताओं की पूजा हजारों वर्षों से होती आई है।उनका वाहन नंदी बैल, गले में सर्प, भस्म से लिपटा शरीर और जटाओं से निकलती गंगा – यह सभी प्रतीक उन्हें 'धरती के देवता' की तरह दर्शाते हैं, जो साधारण जनमानस के बेहद करीब हैं। शिव की आराधना में किसी विशेष विधि-विधान की आवश्यकता नहीं होती – एक बेलपत्र, जल की कुछ बूंदें, और सच्ची श्रद्धा ही पर्याप्त होती है।

वैज्ञानिक दृष्टिकोण: प्रतीकवाद या विज्ञान?
शिव की कई बातें प्रतीकात्मक लग सकती हैं, लेकिन उनमें वैज्ञानिक तर्क भी छिपे हैं। शिव का तीसरा नेत्र – जिसे "ज्ञान चक्षु" कहा जाता है – अंतर्दृष्टि और चेतना का प्रतीक है। यह संकेत देता है कि एक मनुष्य तब तक अधूरा है जब तक वह बाहरी दृष्टि से आगे बढ़कर आंतरिक ज्ञान को नहीं समझता।उनकी जटाओं से बहती गंगा जीवनदायिनी ऊर्जा का प्रतीक है, जबकि गले में पड़ा विष (कालकूट) बताता है कि समाज के लिए घातक तत्वों को संयम और धैर्य से कैसे नियंत्रित किया जा सकता है।शिव का तांडव न केवल विनाश का प्रतीक है, बल्कि यह सृजन की प्रक्रिया का भी हिस्सा है – आधुनिक फिजिक्स में भी यह सिद्धांत मौजूद है कि किसी भी नई व्यवस्था की शुरुआत के लिए पुरानी व्यवस्था का अंत जरूरी है।

आधुनिक युग में शिव की प्रासंगिकता
आज के भागदौड़ भरे जीवन में जहां मानसिक तनाव, आत्महत्या, अवसाद और नैतिक पतन जैसे संकट तेजी से बढ़ रहे हैं, शिव का ध्यानमग्न स्वरूप हमें आत्म-संयम, एकाग्रता और आंतरिक संतुलन की सीख देता है।हर साल शिवरात्रि पर लाखों लोग उपवास रखते हैं, रात्रि जागरण करते हैं, और शिव का ध्यान करते हैं। यह केवल एक धार्मिक परंपरा नहीं, बल्कि एक मनोवैज्ञानिक और सामाजिक अभ्यास भी है – जब व्यक्ति आत्मचिंतन करता है, अपने भीतर झांकता है और अपने कर्मों का मूल्यांकन करता है।साथ ही, शिव का 'वैराग्य' भी आज की उपभोक्तावादी संस्कृति को एक चुनौती देता है। वे सिखाते हैं कि भौतिक वस्तुओं में सुख ढूंढने के बजाय, आत्मा की शांति अधिक महत्वपूर्ण है।

निष्कर्ष: शिव – केवल देव नहीं, एक दर्शन
इसलिए जब हम यह पूछते हैं कि "आखिर भगवान शिव कौन हैं?" तो उत्तर केवल एक धार्मिक कथा में सीमित नहीं रह जाता। वे एक विचारधारा हैं, एक ऊर्जा हैं, जो मनुष्य को उसके मूल स्वभाव से जोड़ती है।शिव को समझने के लिए न तो किसी धर्मग्रंथ की आवश्यकता है, न ही किसी पूजापद्धति की – बस एक खुला मन चाहिए जो प्रतीकों के पीछे के अर्थ को समझ सके।वे हर उस व्यक्ति में हैं जो भीतर की शांति चाहता है, जो सत्य के मार्ग पर चलना चाहता है, और जो इस अस्तित्व की गहराई को महसूस करना चाहता है।

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