बांग्लादेश के प्राचीन हिंदू मंदिरों का दर्दनाक सच, ढाकेश्वरी से रमना काली तक 11 पवित्र स्थल अपनी पहचान बचाने की लड़ रहे जंग
बांग्लादेश में हाल ही में हिंदू समुदाय पर कई हिंसक हमले हुए हैं और धार्मिक स्थलों को निशाना बनाने की घटनाएं भी हुई हैं। सोमवार रात को एक और चौंकाने वाली घटना हुई, जिसमें नरसिंगदी जिले के पलाश उप-जिले में एक हिंदू दुकानदार की बेरहमी से हत्या कर दी गई। इस घटना से पिछले कुछ दिनों में मारे गए हिंदुओं की संख्या छह हो गई है, जिससे देश में अल्पसंख्यकों की सुरक्षा पर गंभीर सवाल उठ रहे हैं। यह आंकड़ा सिर्फ उन मौतों का है जिनकी सार्वजनिक रूप से रिपोर्ट की गई है, जबकि बांग्लादेश में हिंदुओं को लगातार निशाना बनाया जा रहा है। इस लेख में, हम आपको बांग्लादेश के उन ऐतिहासिक मंदिरों के बारे में बताएंगे जो अपनी पहचान बचाने के लिए संघर्ष कर रहे हैं। सदियों पुराने शक्ति पीठों के इतिहास से लेकर वर्तमान की दर्दनाक सच्चाई तक, बांग्लादेश के प्राचीन हिंदू मंदिरों के बारे में सब कुछ जानें...
1- ढाकेश्वरी मंदिर
ढाकेश्वरी राष्ट्रीय मंदिर बांग्लादेश के पुराने ढाका में स्थित एक हिंदू मंदिर है। इसे बांग्लादेश के 'राष्ट्रीय मंदिर' का दर्जा प्राप्त है। 'ढाकेश्वरी' नाम का मतलब है 'ढाका की देवी'। बांग्लादेश दुनिया का एकमात्र मुस्लिम-बहुल देश है जहाँ एक राष्ट्रीय हिंदू मंदिर है। यह सबसे पवित्र शक्ति पीठों में से एक है जहाँ माना जाता है कि देवी सती के मुकुट का एक रत्न गिरा था, लेकिन वह रत्न बहुत पहले खो गया था, और बांग्लादेश में हिंदू मंदिरों पर बढ़ते हमलों के कारण, विभाजन के दौरान मुख्य पुजारी ने मुख्य प्राचीन मूर्ति या पत्थर की छवि को पश्चिम बंगाल के कुमारटुली में स्थानांतरित कर दिया था।
2- जशोरेश्वरी शक्ति पीठ
जशोरेश्वरी शक्ति पीठ 51 शक्ति पीठों में से एक है, जो वर्तमान बांग्लादेश के खुलना जिले के ईश्वरपुर गाँव में स्थित है, जहाँ माना जाता है कि देवी सती की बाईं हथेली गिरी थी। इसलिए, इसे 'जशोरेश्वरी' कहा जाता है, और यहाँ के भैरव को 'चंद्र' कहा जाता है। यह बांग्लादेश में एक महत्वपूर्ण और प्राचीन तीर्थ स्थल है, जिसे प्रधानमंत्री मोदी की यात्रा के बाद और अधिक प्रसिद्धि मिली।
3- भवानीपुर शक्ति पीठ
यह क्षेत्र एक प्रमुख शक्ति पीठ के रूप में प्राचीन हिंदू मान्यताओं से जुड़ा है, जहाँ देवी की पूजा की जाती है। यह 51 शक्ति पीठों में से एक है (माना जाता है कि यह वह स्थान है जहाँ देवी सती की बाईं पायल गिरी थी)। यह शाक्त परंपरा का एक बहुत महत्वपूर्ण केंद्र है। यह मंदिर बोगरा में स्थित है।
4. सुगंधा शक्ति पीठ
बांग्लादेश में बारीसाल से 21 किमी उत्तर में, शिकारपुर गाँव में, सुनंदा नदी (सोंध) के किनारे सुगंधा शक्ति पीठ है, जहाँ माना जाता है कि देवी सती की नाक गिरी थी। यहाँ की मुख्य देवी सुनंदा हैं, और भैरव या शिव को त्र्यंबक के नाम से जाना जाता है। यहाँ का मंदिर उग्रतारा मंदिर के नाम से प्रसिद्ध है। मंदिर की पत्थर की दीवारों पर भी देवी-देवताओं की मूर्तियाँ बनी हुई हैं। मंदिर परिसर को देखकर पता चलता है कि यह मंदिर बहुत प्राचीन है।
5. महालक्ष्मी शक्ति पीठ
बांग्लादेश में महालक्ष्मी शक्ति पीठ सिलहट के पास जयनपुर गाँव में स्थित है, जहाँ माना जाता है कि देवी सती का गला गिरा था, जिससे यह हिंदुओं के लिए एक महत्वपूर्ण स्थान बन गया है। इसे स्थानीय रूप से श्री श्री महालक्ष्मी भैरवी गर्भ महा पीठ के नाम से जाना जाता है, जहाँ उनकी पूजा महालक्ष्मी के रूप में की जाती है, और उनके भैरव संबरानंद हैं, जिनकी अक्सर बिना छत वाली चट्टान (शिला) के रूप में पूजा की जाती है।
6. चट्टल भवानी शक्तिपीठ
बांग्लादेश के चटगाँव ज़िले के सीताकुंड में चंद्रनाथ पहाड़ी पर स्थित, यह 51 शक्तिपीठों में से एक है; यहीं पर देवी सती का दाहिना हाथ गिरा था, और यहाँ उनकी पूजा 'भवानी' के रूप में की जाती है, जबकि भैरव 'चंद्रशेखर' हैं। यह जगह अपनी प्राकृतिक सुंदरता और आध्यात्मिक महत्व के लिए जानी जाती है, और यहाँ कई पवित्र तालाब भी हैं।
7. श्रावणी शक्तिपीठ (या सर्वानी शक्तिपीठ)
यह भारत और बांग्लादेश में दो प्रमुख जगहों से जुड़ा है: एक बांग्लादेश के चटगाँव ज़िले के कुमिरा में, जहाँ देवी सती की रीढ़ की हड्डी गिरी थी, और दूसरा भारत के तमिलनाडु के कन्याकुमारी में, जहाँ देवी भगवती की पूजा की जाती है। यह स्थान तांत्रिक प्रथाओं के लिए महत्वपूर्ण है और इसे श्रावणी या श्रवणी शक्तिपीठ भी कहा जाता है, जहाँ देवी को सर्वानी/श्रवणी और भैरव को निमिषवैभव के नाम से जाना जाता है।
8. अपर्णा शक्तिपीठ
बांग्लादेश के शेरपुर ज़िले के भवानीपुर गाँव में करतोया नदी के किनारे स्थित, यह एक महत्वपूर्ण शक्तिपीठ है जहाँ देवी सती के बाएं पैर की पायल गिरी थी। यहाँ देवी अपर्णा (भवानी/काली) की पूजा की जाती है, और उनके भैरव वामन हैं। यह जगह त्वचा रोगों को ठीक करने और आध्यात्मिक शांति प्रदान करने के लिए प्रसिद्ध है और बांग्लादेश के प्रमुख हिंदू तीर्थ स्थलों में से एक है।
9. जयंती शक्तिपीठ
बांग्लादेश में जयंती शक्तिपीठ सिलहट ज़िले के कनाईघाट के बौरबाग गाँव में स्थित है, जहाँ किंवदंती के अनुसार, देवी सती की बाईं जांघ गिरी थी, और यह 51 शक्तिपीठों में से एक है। यह प्राचीन स्थल, जो पहले जयंतिया साम्राज्य का हिस्सा था, अब श्रीहट्टा (वर्तमान सिलहट) से लगभग 43 किमी दूर है और इसे 'बाम जंघा पीठ' या 'फलीझुर कालीबाड़ी' के नाम से भी जाना जाता है, जहाँ देवी जयंती और भैरव क्रमादीश्वर की पूजा की जाती है।
10. रमना काली मंदिर
यह जानकारी बिल्कुल सही है कि 1971 में 'ऑपरेशन सर्चलाइट' के दौरान पाकिस्तानी सेना ने इसे पूरी तरह से नष्ट कर दिया था। भारत सरकार की मदद से, हाल के सालों में इसे फिर से बनाया और रेनोवेट किया गया है। यह मंदिर ढाका के रमना इलाके में स्थित है। इसे 16वीं सदी में मुगल काल में बनाया गया था। यह मंदिर भारत और बांग्लादेश के बंटवारे से पहले से ही एक प्रमुख हिंदू धार्मिक स्थल रहा है। 1971 के मुक्ति युद्ध के दौरान इसके विनाश का एक दर्दनाक इतिहास भी है। धार्मिक संघर्षों के इतिहास के कारण, इस जगह को आज भी याद किया जाता है।
11. महिलाड़ा सरकार मठ
यह बारीशाल में 18वीं सदी का एक मठ है, जो अपनी वास्तुकला के लिए जाना जाता है। 18वीं सदी में अलीवर्दी खान के समय में बना यह मंदिर शिखर शैली का एक प्राचीन हिंदू धार्मिक स्थल है और पुरातात्विक रूप से संरक्षित है। वर्तमान में संरक्षण के तहत, भीड़भाड़ और सांस्कृतिक तनावों के कारण इसकी सुरक्षा और संरक्षण महत्वपूर्ण बना हुआ है।

