Muharram 2020 : मोहर्रम में क्यों बनाते है ताजिया, जानिए इसका महत्व
इस्लाम धर्म के कैलेंडर में मोहर्रम के महीने को पाक माना जाता हैं मोहर्रम इस्लामिक कैलेंडर का पहला महीना होता हैं गम के इस महीने में मोहर्रम की जुलूस निकाली जाती हैं और साथ ही में ताजिया भी निकलती हैं मोहर्रम महीने के दसवें दिन, जिसे आशुरा कहा जाता हैं
उस दिन हजरत इमाम हुसैन ने कर्बला में अपने 72 साथियों के साथ इंसानियत के लिए शहादत दी थी। उनकी याद में ही इस दिन ताजिया और जुलूस निकाले जाते हैं मगर ताजिया निकालने की परंपरा केवल शिया मुसलमानों में ही देखी जाती हैं जबकि सुन्नी समुदाय के लोग तजियादारी नहीं करते हैं तो आज हम आपको अपने इस लेख में इसी के बारे में बताने जा रहे हैं तो आइए जानते हैं।
आपको बता दें कि मोहर्रम महीने के दसवें दिन तजियादारी की जाती हैं इराक में हजरत इमाम हुसैन की दरगाह हैं उसकी ही कॉपी करके एक संरचना बनाई जाती हैं जिसे ताजिया कहा जाता हैं। ताजिया को कपड़े, कागज और बांस या लकड़ी की सहायता से बनाया जाता हैं।
मोहर्रम महीने का चांद निकलने के बाद पहले ही दिन से ताजिया रखने की शुरूवात हो जाती हैं उसे फिर आशुरा यानी कि मोहर्रम के दसवें दिन कर्बला में दफना कर दिया जाता हैं मोहर्रम के दसवें दिन ताजिया का जुलूस इमामबाड़े से शुरू होता हैं और कर्बला पर जाकर समाप्त हो जाता हैं।
ताजिया के जुलूस में लोग काले रंग के कपड़े पहनकर मातम मनाते हैं। कहा जाता हैं कि मोहर्रम में ताजियादारी का आगाज भारत से ही हुआ हैं बादशाह तैमूर लंग के शासन काल में सबसे पहले ताजिया बना था।

