2 मिनट के वीडियो में जाने कैसे शत्रुओं का नाश धन में वृद्धि करता है भगवान शिव का ये चमत्कारी मंत्र, जानिए इसका आध्यात्मिक महत्त्व
ज्योतिष शास्त्र के अनुसार भगवान शिव की पूजा करने से व्यक्ति को आरोग्य और सुख-समृद्धि की प्राप्ति होती है। साथ ही यह भी माना जाता है कि जो व्यक्ति भोलेनाथ की पूजा करता है, उस पर ग्रहों का नकारात्मक प्रभाव नगण्य होता है। वहीं शास्त्रों में भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए कई स्तोत्रों का वर्णन किया गया है। इनमें से प्रमुख है शिव रुद्राष्टकम। अर्थात जो व्यक्ति इस स्तोत्र का पाठ करता है। उसे शत्रुओं पर विजय प्राप्त होती है। साथ ही उस पर भगवान शिव की अपार कृपा होती है।
श्री शिव रुद्राष्टकम पाठ की जप विधि
शास्त्रों के अनुसार अगर कोई शत्रु आपको परेशान कर रहा है तो किसी मंदिर या घर में शिवलिंग स्थापित करें। इसके बाद कुशा के आसन पर बैठकर लगातार 7 दिनों तक इस स्तोत्र का पाठ करें। भगवान शिव की कृपा से आपको शत्रुओं पर विजय प्राप्त होगी। क्योंकि भोलेनाथ हमेशा अपने भक्तों की रक्षा करते हैं। इसके पाठ से व्यक्ति में आत्मविश्वास और मनोबल बढ़ता है।
श्री शिव रुद्राष्टकम का महत्व
शिव रुद्राष्टकम में भगवान शिव के स्वरूप और शक्तियों का वर्णन किया गया है। शास्त्रों के अनुसार भगवान श्री राम ने लंका पर विजय प्राप्त करने से पहले शिव रुद्राष्टकम का पाठ किया था। जब भोलेनाथ ने रामेश्वरम में शिवलिंग की स्थापना की, उसके बाद उन्होंने इस स्तोत्र का पाठ किया। शिव रुद्राष्टकम का जाप करने से शत्रुओं पर विजय प्राप्त होती है। साथ ही इसका जाप करने से जीवन में सुख-समृद्धि आती है।
शिव रुद्राष्टकम पाठ
नमामीशमीशान निर्वाणरूपं
विभुं व्यापकं ब्रह्मवेदस्वरूपम्
निजं निर्गुणं निर्विकल्पं निरीहं
चिदाकाशमाकाशवासं भजेहम्
निराकारमोङ्करमूलं तुरीयं
गिराज्ञानगोतीतमीशं गिरीशम् ।
करालं महाकालकालं कृपालं
गुणागारसंसारपारं नतोहम्
तुषाराद्रिसंकाशगौरं गभिरं
मनोभूतकोटिप्रभाश्री शरीरम् ।
स्फुरन्मौलिकल्लोलिनी चारुगङ्गा
लसद्भालबालेन्दु कण्ठे भुजङ्गा
चलत्कुण्डलं भ्रूसुनेत्रं विशालं
प्रसन्नाननं नीलकण्ठं दयालम् ।
मृगाधीशचर्माम्बरं मुण्डमालं
प्रियं शङ्करं सर्वनाथं भजामि
प्रचण्डं प्रकृष्टं प्रगल्भं परेशं
अखण्डं अजं भानुकोटिप्रकाशं ।
त्र्यःशूलनिर्मूलनं शूलपाणिं
भजेहं भवानीपतिं भावगम्यम्
कलातीतकल्याण कल्पान्तकारी
सदा सज्जनानन्ददाता पुरारी ।
चिदानन्दसंदोह मोहापहारी
प्रसीद प्रसीद प्रभो मन्मथारी
न यावद् उमानाथपादारविन्दं
भजन्तीह लोके परे वा नराणाम् ।
न तावत्सुखं शान्ति सन्तापनाशं
प्रसीद प्रभो सर्वभूताधिवासं
न जानामि योगं जपं नैव पूजां
नतोहं सदा सर्वदा शम्भुतुभ्यम् ।
जराजन्मदुःखौघ तातप्यमानं
प्रभो पाहि आपन्नमामीश शंभो

