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महाभारत के वीर योद्धा बर्बरीक कैसे बने खाटू श्याम जी? 2 मिनट के आध्यात्मिक वीडियो में जाने महाभारत काल की ये अद्भुत कथा 

महाभारत के वीर योद्धा बर्बरीक कैसे बने खाटू श्याम जी? 2 मिनट के आध्यात्मिक वीडियो में जाने महाभारत काल की ये अद्भुत कथा 

राजस्थान के सीकर जिले में स्थित खाटू श्याम जी का मंदिर आज न केवल एक धार्मिक स्थल है, बल्कि भक्ति और श्रद्धा का केंद्र भी है। लाखों भक्त हर साल यहां दर्शन के लिए आते हैं। पर क्या आपने कभी सोचा है कि खाटू श्याम जी कौन हैं? उन्हें कलियुग में "श्याम बाबा" के रूप में क्यों पूजा जाता है? इसके पीछे छिपी है एक दिव्य और अत्यंत भावुक करने वाली कथा जो महाभारत काल से जुड़ी हुई है।


कौन हैं खाटू श्याम जी?
खाटू श्याम जी को भगवान श्रीकृष्ण के वंशज बर्बरीक के रूप में जाना जाता है। वे भीम (महाभारत के पांडव) के पोते और घटोत्कच के पुत्र थे। बचपन से ही उनमें अद्भुत शक्ति थी और उन्होंने अपनी माता मोरवी से युद्ध कला सीखी थी। बर्बरीक का स्वभाव शांत और दयालु था, परंतु युद्ध कौशल में वे इतने निपुण थे कि केवल तीन बाणों से पूरी महाभारत जीत सकते थे।

श्रीकृष्ण की परीक्षा और बर्बरीक का बलिदान
महाभारत युद्ध से पहले श्रीकृष्ण को ज्ञात था कि बर्बरीक युद्ध में भाग लेने जा रहे हैं। श्रीकृष्ण जानते थे कि बर्बरीक निष्पक्ष थे और जो भी पक्ष कमजोर होगा, वे उसी का साथ देंगे। इसका अर्थ था कि युद्ध का संतुलन बिगड़ जाएगा।श्रीकृष्ण ने एक ब्राह्मण के वेश में बर्बरीक की परीक्षा ली। उन्होंने पूछा कि तुम कितने बाणों से युद्ध जीत सकते हो? बर्बरीक ने उत्तर दिया – “मुझे केवल तीन बाण की आवश्यकता होगी। पहला बाण सभी शत्रुओं को चिन्हित करेगा, दूसरा उन्हें नष्ट करेगा और तीसरा वापस लौट आएगा।”यह सुनकर श्रीकृष्ण समझ गए कि यदि बर्बरीक युद्ध में शामिल होते हैं, तो युद्ध का सार ही बदल जाएगा। तब श्रीकृष्ण ने उनसे "दान" स्वरूप उनका सिर मांग लिया। बर्बरीक, जिन्हें भक्ति में गहरी श्रद्धा थी, बिना किसी झिझक के सिर देने को तैयार हो गए। उन्होंने श्रीकृष्ण से प्रार्थना की कि वे उनका सिर युद्ध के मैदान से युद्ध देख सके। श्रीकृष्ण ने उनका यह वरदान स्वीकार किया।

कलियुग में पूजे जाने का वरदान
इस महान बलिदान और अटूट भक्ति से श्रीकृष्ण अत्यंत प्रसन्न हुए। उन्होंने बर्बरीक को आशीर्वाद दिया कि कलियुग में तुम्हारे नाम से भक्त तुम्हारी पूजा करेंगे और तुम “श्याम” नाम से पूजे जाओगे। चूंकि बर्बरीक ने श्रीकृष्ण को अपना सब कुछ अर्पण किया था, इसलिए वे स्वयं श्रीकृष्ण के स्वरूप बन गए और उन्हें “खाटू श्याम” कहा जाने लगा।

खाटू श्याम मंदिर और वर्तमान स्वरूप
खाटू श्याम जी का प्रसिद्ध मंदिर राजस्थान के सीकर जिले के खाटू गांव में स्थित है। ऐसा माना जाता है कि जहां श्याम बाबा का सिर पड़ा था, वहीं यह मंदिर बना। इस मंदिर में स्थित श्याम बाबा की प्रतिमा बहुत ही चमत्कारी मानी जाती है।मंदिर में फाल्गुन माह की शुक्ल एकादशी को हर साल विशाल मेला लगता है जिसे "श्याम महोत्सव" कहते हैं। लाखों श्रद्धालु दूर-दूर से पैदल यात्रा करके बाबा के दर्शन करने आते हैं।

क्यों कहते हैं खाटू श्याम जी को 'कलियुग के कृष्ण'?
यह विश्वास है कि कलियुग में जब भी कोई भक्त सच्चे ह्रदय से श्याम बाबा को पुकारता है, तो वे उसकी रक्षा करते हैं। यही कारण है कि उन्हें “कलियुग के कृष्ण” कहा जाता है। वे गरीब-अमीर, जात-पात, धर्म से परे सभी की प्रार्थना सुनते हैं।भक्तों का यह भी मानना है कि बाबा श्याम को सिंदूर, चोला, फूल, मिठाई, और खीर का भोग अत्यंत प्रिय है। जो भी उन्हें श्रद्धा से अर्पित करता है, उसकी मनोकामनाएं अवश्य पूरी होती हैं।

खाटू श्याम जी की भक्ति का प्रभाव
खाटू श्याम बाबा की भक्ति केवल राजस्थान में ही नहीं, बल्कि भारत के हर कोने में फैली हुई है। गुजरात, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, दिल्ली, बिहार और बंगाल तक उनके भक्तों की संख्या लाखों में है। यहां तक कि विदेशों में रहने वाले भक्त भी ऑनलाइन पूजा और दर्शन के माध्यम से बाबा से जुड़ते हैं।

खाटू श्याम जी की कथा केवल पौराणिक गाथा नहीं है, बल्कि यह समर्पण, त्याग और निःस्वार्थ भक्ति का प्रतीक है। बर्बरीक के बलिदान में श्रीकृष्ण का विश्वास और उनका दिया गया वरदान, दोनों मिलकर हमें यह सिखाते हैं कि सच्ची भक्ति किसी भी युग में पूजनीय बन जाती है।जो भक्त सच्चे मन से श्याम बाबा की शरण में आता है, उसका जीवन कष्टों से मुक्त हो जाता है। यही कारण है कि खाटू श्याम जी आज आस्था, चमत्कार और कृपा के प्रतीक बन चुके हैं।

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