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प्लास्टिक कचरे के खात्मे का क्रांतिकारी तरीका: वैज्ञानिकों ने लैब में बनाया पेट्रोल और डीजल, सफल रहा परीक्षण

प्लास्टिक कचरे के खात्मे का क्रांतिकारी तरीका: वैज्ञानिकों ने लैब में बनाया पेट्रोल और डीजल, सफल रहा परीक्षण

दुनियाभर में तेजी से बढ़ता प्लास्टिक कचरा पर्यावरण के लिए बड़ी चुनौती बन चुका है। रोजमर्रा की जिंदगी में इस्तेमाल होने वाली कई चीजें प्लास्टिक से बनी होती हैं और इस्तेमाल के बाद इनके कचरे को दोबारा उपयोग में लाना आसान नहीं होता। प्लास्टिक लंबे समय तक नष्ट नहीं होता, जिसकी वजह से यह जमीन, पानी और पर्यावरण के लिए परेशानी का कारण बनता है।अब वैज्ञानिकों ने प्लास्टिक कचरे को उपयोगी ईंधन में बदलने की दिशा में एक महत्वपूर्ण तरीका खोजा है। अमेरिका के टेनेसी स्थित ओक रिज नेशनल लेबोरेटरी (ORNL) के शोधकर्ताओं ने एक ऐसी प्रक्रिया पर काम किया है, जिसमें प्लास्टिक को तोड़कर पेट्रोल-डीजल जैसे ईंधन में इस्तेमाल होने वाले हाइड्रोकार्बन तैयार किए जा सकते हैं।

पॉलीइथिलीन पर किया गया प्रयोग

शोधकर्ताओं ने इस प्रयोग के लिए पॉलीइथिलीन का इस्तेमाल किया। यह दुनिया में सबसे ज्यादा इस्तेमाल किए जाने वाले प्लास्टिक के प्रकारों में से एक है और कई रोजमर्रा की प्लास्टिक वस्तुओं में पाया जाता है।

लैब में किए गए प्रयोग के दौरान वैज्ञानिकों ने प्लास्टिक को तोड़ने के लिए पिघले हुए लवण यानी मोल्टेन साल्ट का इस्तेमाल किया। खास बात यह रही कि इस प्रक्रिया में करीब 200 डिग्री सेल्सियस तापमान का इस्तेमाल किया गया। रिपोर्ट के मुताबिक, प्रयोग के दौरान प्लास्टिक से करीब 60 प्रतिशत गैसोलीन प्राप्त हुआ।

200 डिग्री तापमान क्यों है खास?

प्लास्टिक को ईंधन या दूसरे उपयोगी रसायनों में बदलने के लिए पारंपरिक तरीकों में अक्सर काफी ज्यादा तापमान की जरूरत पड़ती है। कई प्रक्रियाओं में तापमान करीब 450 से 500 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच सकता है।

इसके मुकाबले 200 डिग्री सेल्सियस का तापमान काफी कम है। यही वजह है कि वैज्ञानिकों के लिए यह तरीका खास महत्व रखता है। कम तापमान पर प्रक्रिया होने से भविष्य में ऊर्जा की जरूरत और प्रक्रिया की लागत को कम करने की संभावनाओं पर भी शोध किया जा सकता है।

वैज्ञानिकों ने कैसे किया प्रयोग?

इस तकनीक में एल्युमीनियम क्लोराइड वाले पिघले हुए लवण को प्रतिक्रिया के माध्यम के तौर पर इस्तेमाल किया गया। इन लवणों को गर्म करने पर वे पिघलकर तरल अवस्था में आ जाते हैं।

स्टडी के सह-लेखक झेनझेन यांग के मुताबिक, शोधकर्ताओं ने व्यावसायिक रूप से उपलब्ध अकार्बनिक लवणों का इस्तेमाल किया और इन्हें माध्यम बनाकर पॉलीमर कचरे को उपयोगी ईंधन संबंधी उत्पादों में बदलने की कोशिश की।

इस प्रक्रिया की खास बात यह बताई गई कि इसमें किसी अलग उत्प्रेरक इनिशिएटर या सॉल्वेंट की जरूरत नहीं पड़ी और अपेक्षाकृत कम तापमान पर प्लास्टिक की लंबी पॉलीमर चेन को तोड़ने का काम किया गया।

प्लास्टिक की लंबी चेन कैसे टूटी?

पॉलीइथिलीन कार्बन और हाइड्रोजन परमाणुओं से बनी लंबी चेन से तैयार होता है। वैज्ञानिकों ने पाया कि पिघले हुए लवण में मौजूद एल्युमीनियम साइट्स काफी एसिडिक हो जाती हैं।

ये एसिडिक साइट्स रासायनिक प्रतिक्रिया शुरू करने में मदद करती हैं। इसके बाद प्लास्टिक की लंबी चेन छोटे-छोटे हाइड्रोकार्बन मॉलिक्यूल में टूटने लगती है। ये हाइड्रोकार्बन ऐसे यौगिकों से जुड़े होते हैं जिनका इस्तेमाल ईंधन तैयार करने में किया जाता है।

प्लास्टिक प्रदूषण से निपटने में मिल सकती है मदद

अगर इस तकनीक को बड़े स्तर पर प्रभावी और आर्थिक रूप से इस्तेमाल करने योग्य बनाया जा सका, तो भविष्य में प्लास्टिक कचरे को सिर्फ समस्या के तौर पर देखने के बजाय उसे उपयोगी संसाधन में बदलने का रास्ता खुल सकता है।हालांकि, लैब में सफल प्रयोग और बड़े पैमाने पर व्यावसायिक इस्तेमाल के बीच काफी अंतर होता है। इसलिए इस तकनीक की वास्तविक लागत, ऊर्जा खपत, पर्यावरणीय प्रभाव और बड़े स्तर पर इसकी उपयोगिता को लेकर आगे और शोध की जरूरत होगी।फिलहाल वैज्ञानिकों की यह खोज प्लास्टिक कचरे को उपयोगी हाइड्रोकार्बन में बदलने की दिशा में एक दिलचस्प कदम मानी जा रही है।

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