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शोधकर्ताओं ने किया चौकाने वाला खुलासा, कहा-IVF treatment से महिलाओं में 66 प्रतिशत तक बढ़ सकता है स्ट्रोक का खतरा 

एक चौंकाने वाले अध्ययन में यह बात सामने आई है कि जिन महिलाओं को विट्रो-फर्टिलाइजेशन (आईवीएफ) का उपचार मिला है, उनमें प्रसव के 12 महीनों के भीतर स्ट्रोक का खतरा बढ़ जाता ....
श्रीराम की नगरी में जैसे-जैसे भव्य मंदिर निर्माण कार्य हो रहा है, वैसे-वैसे देश-विदेश से रामभक्तों की भारी भीड़ लगातार अयोध्या आ रही है। ऐसे में मंदिर निर्माण पूरा होते ही प्रतिदिन लाखों की संख्या में देश-विदेश से श्रद्धालुओं के आने का अनुमान है।  अयोध्या आने के लिए उनको सुगम मार्ग उपलब्ध हो, इसके लिए जन्मभूमि पथ, भक्ति पथ व राम पथ का निर्माण प्रगति पर है। निर्माणाधीन पथों पर यात्रियों को यात्रा की सुविधा प्रदान करने के लिए योगी सरकार शीघ्र ही ई-बस सेवा प्रारंभ करने जा रही है।  मतलब यह कि इन पथों के निर्माण के पहले अयोध्या धाम में ई-बस सेवा की शुरुआत हो जाएगी। शासन ने अयोध्या सहित प्रदेश के विभिन्न तीर्थों के लिए योजना बनाई है।  इस व्यवस्था का संचालन करने के लिए शासन स्तर पर ही इलेक्ट्रिक बसों के क्रय की प्रक्रिया की जानी है। शासन स्तर पर पूरे प्रदेश के लिए एक साथ ई-बसें क्रय की जाएंगी।  अयोध्या नगर निगम की ओर से संचालित की जाने वाली इस योजना को लेकर एडीए के वीसी व नगर आयुक्त विशाल सिंह ने बताया कि शासन स्तर से 25 इलेक्ट्रिक बसों का बेड़ा स्वीकृत किया गया है।  बसें सितंबर में अयोध्या नगर निगम को मिलने की उम्मीद है। इन बसों के वर्कशाप एवं चार्जिंग स्टेशन के निर्माण का जिम्मा उत्तर प्रदेश जल निगम की सी एण्ड डीएस यूनिट-44 को दिया गया है।  उन्होंने बताया कि वर्कशॉप/डिपो के निर्माण के अलावा चार्जिंग स्टेशन के निर्माण के लिए चयनित एजेंसी को 12.50 करोड़ की राशि आवंटित कर दी गयी है। अयोध्या में इलेक्ट्रिक बसों के संचालन के लिए चैत्र रामनवमी मेला के दौरान ट्रायल किया गया था।  इसके लिए लखनऊ डिपो से बसें भेजी गयी थी। इसके साथ व्यवस्था की देखरेख के लिए लखनऊ से ही एआरएम समेत आधा दर्जन कर्मचारियों को भी अस्थाई रूप से तैनात किया गया था। हाईवे के अंतरराज्यीय बस अड्डे परिसर में ही चार्जिंग स्टेशन बनाया गया था।  राम पथ के निर्माणाधीन होने के कारण इनका संचालन शहर के बाहर ही किया गया। शासन की ओर से संचालित इलेक्ट्रिक बसों को फिलहाल नि:शुल्क ही नौ दिनों तक चलाया गया था।  बस संचालन की सफलता के बाद निर्णय लिया गया था कि अयोध्या में राम मंदिर निर्माण व निर्माणाधीन पथों का निर्माण पूरा होने के साथ ही नगर में बाहर से आने वाले राम भक्तों को अयोध्या दर्शन करने के लिए ई-बस सेवा उपलब्ध कराई जाय।

विज्ञान न्यूज डेस्क !!! एक चौंकाने वाले अध्ययन में यह बात सामने आई है कि जिन महिलाओं को विट्रो-फर्टिलाइजेशन (आईवीएफ) का उपचार मिला है, उनमें प्रसव के 12 महीनों के भीतर स्ट्रोक का खतरा बढ़ जाता है। रटगर्स यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं ने 31,339,991 गर्भवती महिलाओं पर एक विश्लेषण किया, जिन्‍होंने 2010 से 2018 के बीच प्रसव कराया था। साथ ही उनका भी विश्लेषण किया गया, जिन्‍हें बांझपन का इलाज नहीं मिला। जेएएमए नेटवर्क ओपन में प्रकाशित पेपर में बताया गया है कि हालांकि अस्पताल में भर्ती होने की पूर्ण दर कम थी, लेकिन पाया गया कि बांझपन उपचार के मामलों में 66 प्रतिशत मामले स्ट्रोक के जोखिम से जुड़े थे।

उनमें स्ट्रोक के घातक रूप, रक्तस्रावी स्ट्रोक से पीड़ित होने की संभावना दोगुनी थी, वहीं इस्केमिक स्ट्रोक से पीड़ित होने की संभावना 55 प्रतिशत अधिक थी। इस्केमिक स्ट्रोक, अधिक सामान्य, मस्तिष्क के एक क्षेत्र में रक्त की आपूर्ति के नुकसान के कारण होता है, जबकि रक्तस्रावी स्ट्रोक रक्त वाहिका के टूटने से मस्तिष्क में रक्तस्राव के कारण होता है। महत्वपूर्ण बात यह है कि जोखिम में वृद्धि प्रसव के बाद पहले 30 दिनों में भी स्पष्ट थी।

यह अध्ययन तब सामने आया है, जब हाल के वर्षों में प्रौद्योगिकी में पर्याप्त प्रगति और नई दवाओं के विकास से बांझपन के इलाज में तेजी आई है। हृदय रोग (सीवीडी) महिलाओं में मृत्यु का प्रमुख कारण बना हुआ है। हर साल तीन में से एक मौत सीवीडी के कारण होती है। स्ट्रोक पुरुषों और महिलाओं दोनों में मृत्यु का तीसरा प्रमुख कारण है। अध्ययनों से संकेत मिलता है कि 5 में से 1 महिला को अपने जीवनकाल में स्ट्रोक होने का खतरा होता है। सबूत बताते हैं कि कई लोग उन स्वास्थ्य कारकों को नहीं जानते हैं जो उन्हें स्ट्रोक या अन्य सीवीडी के खतरे में डालते हैं।

अध्ययन में इसके पीछे के कारणों का पता नहीं चल पाया है। शोधकर्ताओं ने कहा कि यह उन हार्मोन उपचारों के कारण हो सकता है, जो प्रक्रियाओं से गुजरने वाली महिलाएं लेती हैं। साथ ही उन महिलाओं के लिए अधिक जोखिम है, जिनमें ठीक से प्लेसेंटा इम्प्लांट नहीं होता। शोधकर्ताओं ने स्ट्रोक के जोखिम को कम करने के लिए प्रसव के तुरंत बाद के दिनों में समय पर फॉलो-अप और दीर्घकालिक फॉलो-अप जारी रखने का आह्वान किया।

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