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Climate Change की वजह से 10 सालों में खाद्य कीमतों में दोगुने की बढ़ोतरी, नींद पर भी संकट

जलवायु परिवर्तन अब केवल पर्यावरण का संकट नहीं रह गया है, बल्कि यह मानव जीवन के हर पहलू को प्रभावित कर रहा है — खासकर हमारी थाली और हमारी नींद को। ताजा वैश्विक रिपोर्टों के मुताबिक, यदि मौजूदा रफ्तार से तापमान वृद्धि और चरम मौसमी....
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जलवायु परिवर्तन अब केवल पर्यावरण का संकट नहीं रह गया है, बल्कि यह मानव जीवन के हर पहलू को प्रभावित कर रहा है — खासकर हमारी थाली और हमारी नींद को। ताजा वैश्विक रिपोर्टों के मुताबिक, यदि मौजूदा रफ्तार से तापमान वृद्धि और चरम मौसमी घटनाएं जारी रहीं, तो आने वाले 10 वर्षों में खाद्य पदार्थों की कीमतें दोगुनी हो सकती हैं। इसके साथ ही बढ़ते तापमान और असामान्य मौसम पैटर्न हमारी नींद की गुणवत्ता पर भी गंभीर प्रभाव डाल रहे हैं।

खाद्य कीमतों पर असर

संयुक्त राष्ट्र की एक रिपोर्ट के अनुसार, जलवायु परिवर्तन के कारण कृषि उत्पादन में भारी गिरावट आने की संभावना है। अत्यधिक गर्मी, सूखा, बाढ़ और तूफानों की संख्या में बढ़ोतरी से खेती योग्य जमीन और पैदावार पर बुरा असर पड़ रहा है। गेंहू, चावल, मक्का और सब्जियों जैसी बुनियादी फसलों की उपज में गिरावट से उनकी आपूर्ति घट रही है, जिसके चलते कीमतें आसमान छू रही हैं।

विशेषज्ञों का मानना है कि यदि वैश्विक तापमान में 1.5 डिग्री सेल्सियस से अधिक की वृद्धि होती है, तो खाद्य उत्पादन में 30% तक की गिरावट हो सकती है। भारत जैसे कृषि प्रधान देश में इसका सीधा असर आम जनता की जेब पर पड़ेगा। गरीब और मध्यम वर्ग के लिए दाल, सब्जी, फल और दूध जैसी आवश्यक चीजें भी पहुंच से बाहर हो सकती हैं।

नींद पर संकट

एक अन्य अध्ययन से यह भी सामने आया है कि जलवायु परिवर्तन लोगों की नींद को प्रभावित कर रहा है। तापमान में बढ़ोतरी के कारण शरीर को ठंडा होने में अधिक समय लगता है, जिससे नींद आने में देरी होती है और उसकी गुणवत्ता खराब होती है। विशेष रूप से शहरी क्षेत्रों में जहां कूलिंग संसाधन सीमित हैं या बिजली की कटौती होती है, वहां स्थिति और भी गंभीर है।

शोध के अनुसार, एक डिग्री तापमान बढ़ने से औसतन व्यक्ति की नींद में 15 से 20 मिनट की कमी आ सकती है। लगातार नींद की कमी से मानसिक स्वास्थ्य पर बुरा असर पड़ता है, जिससे चिड़चिड़ापन, डिप्रेशन, और उत्पादकता में गिरावट जैसे लक्षण देखने को मिलते हैं।

समाधान की आवश्यकता

जलवायु परिवर्तन का यह प्रभाव केवल पर्यावरणविदों के लिए चिंता का विषय नहीं है, बल्कि यह आम नागरिक की दिनचर्या, स्वास्थ्य और आर्थिक स्थिरता को भी झकझोर रहा है। विशेषज्ञों का कहना है कि इस संकट से निपटने के लिए सरकारों, किसानों, वैज्ञानिकों और आम लोगों को मिलकर प्रयास करना होगा। टिकाऊ कृषि पद्धतियों को अपनाना, हरित ऊर्जा का विस्तार, जल संरक्षण और खाद्य आपूर्ति श्रृंखला में सुधार जैसे कदम आवश्यक हैं।

जलवायु परिवर्तन अब भविष्य का संकट नहीं, बल्कि वर्तमान की सच्चाई है। समय रहते चेतना जरूरी है, वरना हमारी थाली और हमारी नींद दोनों ही दुर्लभ हो जाएंगी।

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