UP Politics: बाबा बागेश्वर की कथा से लेकर अखिलेश के बयान तक, कुंडा में राजा भैया को घेरने की तैयारी में सपा? समझिए पूरा सियासी गणित
उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव से पहले धार्मिक कथाओं और कथावाचकों को लेकर सियासत तेज होती दिखाई दे रही है। राज्य के अलग-अलग इलाकों में बड़े धार्मिक आयोजनों की तैयारियां चल रही हैं। रायबरेली के ऊंचाहार में पिछले दिनों प्रदीप मिश्रा की कथा का आयोजन हुआ था, जिसे मंत्री मनोज पांडेय ने कराया था। अब जनसत्ता दल लोकतांत्रिक के प्रमुख और कुंडा विधायक राजा भैया ने अपने क्षेत्र में बाबा बागेश्वर यानी धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री की कथा कराने का ऐलान किया है।
इसी बीच समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव ने धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री के एक कथित बयान को लेकर सवाल उठाए हैं। उन्होंने प्रवचन के एक हिस्से पर आपत्ति जताते हुए हमला बोला। इतना ही नहीं, उनके बयान को राजा भैया के आयोजन से जोड़कर भी देखा जा रहा है। अखिलेश ने इशारों में आयोजकों पर निशाना साधते हुए कहा कि कथावाचक तो चले जाएंगे, लेकिन आयोजन कराने वालों को यहीं रहना है।ऐसे में सवाल उठ रहा है कि बाबा बागेश्वर की कथा और धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री के बयान के बहाने कुंडा की राजनीति अचानक चर्चा में क्यों आ गई है? इसके पीछे विधानसभा सीट का जातीय समीकरण और राजा भैया को घेरने की समाजवादी पार्टी की रणनीति अहम मानी जा रही है।
कुंडा में राजा भैया को घेरना चाहती है सपा?
कुंडा विधानसभा सीट लंबे समय से राजा भैया का मजबूत राजनीतिक गढ़ रही है। वह लगातार इस सीट से चुनाव जीतते आए हैं। हालांकि, 2022 के विधानसभा चुनाव में उनकी जीत का अंतर पिछले कई चुनावों के मुकाबले काफी कम रहा था। इसी नतीजे को समाजवादी पार्टी अपने लिए एक राजनीतिक संभावना के रूप में देख सकती है।
2022 में सपा ने राजा भैया के खिलाफ गुलशन यादव को मैदान में उतारा था। इस चुनाव में राजा भैया को 30,315 वोटों के अंतर से जीत मिली थी। यह पिछले करीब 20 वर्षों में उनकी सबसे कम अंतर वाली जीत बताई जाती है।
राजनीतिक जानकारों के मुताबिक, सपा को लगता है कि अगर कुंडा में विपक्षी वोटों को एकजुट किया जाए तो राजा भैया को चुनौती दी जा सकती है। अखिलेश यादव की पीडीए (पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक) रणनीति भी इसी समीकरण का हिस्सा मानी जा रही है।
क्या है कुंडा का जातीय समीकरण?
कुंडा विधानसभा क्षेत्र में अलग-अलग जातियों और समुदायों के मतदाताओं की संख्या चुनावी रणनीति के लिहाज से महत्वपूर्ण है। उपलब्ध अनुमानित आंकड़ों के मुताबिक, यहां यादव मतदाताओं की संख्या करीब 75 हजार बताई जाती है। इसके अलावा लगभग 90 हजार दलित मतदाता हैं, जिनमें पासी समाज की प्रभावी हिस्सेदारी मानी जाती है।
अन्य समुदायों की अनुमानित संख्या इस प्रकार बताई जाती है:
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मुस्लिम मतदाता: करीब 55 हजार
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ब्राह्मण मतदाता: करीब 50 हजार
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कुर्मी मतदाता: करीब 30 हजार
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ठाकुर मतदाता: करीब 18 हजार
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मौर्य मतदाता: करीब 15 हजार
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वैश्य मतदाता: करीब 10 हजार
इन अनुमानों के आधार पर पीडीए के दायरे में आने वाले समुदायों की कुल संख्या काफी बड़ी दिखाई देती है। यही वजह है कि समाजवादी पार्टी इस वोट बैंक को एकजुट करने की कोशिश कर सकती है। हालांकि, जातीय आंकड़े अनुमानित हैं और केवल आबादी के आधार पर किसी चुनाव का नतीजा तय नहीं किया जा सकता।
2022 में राजा भैया की जीत का अंतर क्यों बना चर्चा का विषय?
राजा भैया का कुंडा में लंबे समय से दबदबा रहा है। 2002 के विधानसभा चुनाव में उन्होंने सपा के मोहम्मद शमी को बड़े अंतर से हराया था। इसके बाद 2007 में बसपा के शिव प्रकाश मिश्रा को 53,128 वोटों से मात दी।
2012 के चुनाव में भी राजा भैया ने शिव प्रकाश मिश्रा को करीब 88 हजार वोटों से हराया। वहीं 2017 में भाजपा उम्मीदवार के मुकाबले उनकी जीत का अंतर एक लाख से अधिक रहा।
खास बात यह है कि 2007 से 2017 तक लगातार तीन विधानसभा चुनावों में समाजवादी पार्टी ने राजा भैया के खिलाफ अपना उम्मीदवार नहीं उतारा था। लेकिन 2022 में सपा ने गुलशन यादव को मैदान में उतारकर मुकाबले को दिलचस्प बना दिया।
उस चुनाव में अखिलेश यादव ने भी कुंडा में आक्रामक प्रचार किया था। उन्होंने 'कुंडा में कुंडी लगाने' वाला बयान देकर राजनीतिक माहौल गर्म कर दिया था। गुलशन यादव ने भी पूरी ताकत से चुनाव लड़ा और राजा भैया की जीत का अंतर घटकर 30,315 वोट रह गया।
धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री की कथा के बहाने क्यों तेज हुई सियासत?
राजा भैया की ओर से कुंडा में बाबा बागेश्वर की कथा कराने का ऐलान ऐसे समय हुआ है, जब प्रदेश में धार्मिक आयोजनों को लेकर राजनीतिक चर्चाएं तेज हैं। वहीं अखिलेश यादव की ओर से धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री के प्रवचन पर सवाल उठाने के बाद यह मामला और चर्चा में आ गया।
सियासी नजरिए से देखें तो समाजवादी पार्टी इस मुद्दे को कुंडा के स्थानीय चुनावी समीकरण से जोड़कर देख सकती है। पार्टी की कोशिश पीडीए के मतदाताओं को एक मंच पर लाने की हो सकती है, जबकि राजा भैया के लिए अपने पारंपरिक राजनीतिक आधार को बनाए रखना अहम होगा।

