UP Election 2027: सीटों के सवाल पर सपा-कांग्रेस में बढ़ी खींचतान, क्या चुनाव से पहले टूटेगा भरोसा?
उत्तर प्रदेश में 2027 के विधानसभा चुनाव की तैयारियां तेज होने के साथ ही विपक्षी गठबंधन की सबसे बड़ी चुनौती अब बीजेपी से मुकाबला नहीं, बल्कि आपसी तालमेल बनाना नजर आ रही है। समाजवादी पार्टी और कांग्रेस के बीच गठबंधन की तस्वीर भले ही फिलहाल बनी हुई हो, लेकिन सीटों के बंटवारे और नेतृत्व को लेकर दोनों दलों के नेताओं के बीच बढ़ती बयानबाजी ने कई सवाल खड़े कर दिए हैं।
सहारनपुर से कांग्रेस सांसद इमरान मसूद और सपा सांसद रामाशंकर राजभर के बीच सामने आई तल्खी इसी अंदरूनी खींचतान का संकेत मानी जा रही है। इसके अलावा सहारनपुर में कांग्रेस और सपा नेताओं के बीच सार्वजनिक टकराव भी यह बताता है कि चुनाव से पहले दोनों दलों के लिए सबसे बड़ी चुनौती अपने कार्यकर्ताओं और नेताओं के बीच भरोसा कायम करना होगी।
इमरान मसूद का 'मलाई-छाछ' वाला बयान
3 सितंबर को मथुरा में एक कार्यक्रम के दौरान इमरान मसूद ने सपा के साथ गठबंधन को लेकर कांग्रेस का रुख साफ करते हुए कहा कि पार्टी गठबंधन के लिए तैयार है, लेकिन किसी की दया पर चुनाव नहीं लड़ेगी।
उन्होंने कहा कि अगर 2027 में बीजेपी को हराना है तो सीटों के बंटवारे पर जल्द फैसला करना होगा। इमरान ने 2024 के लोकसभा चुनाव में विपक्षी गठबंधन के प्रदर्शन का श्रेय राहुल गांधी की भारत जोड़ो यात्रा से बने राजनीतिक माहौल को दिया।
कांग्रेस सांसद ने 2017 के विधानसभा चुनाव का भी हवाला दिया, जब पार्टी ने 107 सीटों पर चुनाव लड़ा था। उनका कहना है कि अब कांग्रेस पहले से मजबूत स्थिति में है और इसलिए सीटों का बंटवारा भी उसकी मौजूदा राजनीतिक ताकत के हिसाब से होना चाहिए।
इमरान का यह बयान—'मलाई कोई और खाए, हमें छाछ मंजूर नहीं'—सीट बंटवारे पर कांग्रेस की महत्वाकांक्षा को खुलकर सामने रखता है।
परिवार के भीतर की सियासत ने बढ़ाई तल्खी
गठबंधन की राजनीति के बीच इमरान मसूद के परिवार में हुआ राजनीतिक बदलाव भी चर्चा में है। 20 अगस्त 2026 को उनके दामाद शायान मसूद ने कांग्रेस छोड़कर समाजवादी पार्टी का दामन थाम लिया।
इमरान ने इस घटनाक्रम पर भावुक प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनकी बेटी छह महीने से घर पर बैठी है और एक पिता के तौर पर वह इसकी पीड़ा समझते हैं। हालांकि, अखिलेश यादव को सीधे जिम्मेदार ठहराने से उन्होंने इनकार किया और कहा कि वह किसी व्यक्ति को नहीं, बल्कि वक्त को दोष दे रहे हैं।
यह घटनाक्रम भी दोनों दलों के बीच बढ़ती राजनीतिक दूरी की चर्चा को हवा देता है।
सपा का पलटवार—पहले नतीजों की समीक्षा कीजिए
इमरान मसूद के बयानों पर सपा सांसद रामाशंकर राजभर ने पलटवार किया। उनका कहना था कि कांग्रेस सीटें तो मांगती है, लेकिन चुनावी नतीजों की समीक्षा नहीं करती।
राजभर इससे पहले भी इमरान मसूद पर तीखी टिप्पणी कर चुके हैं। उन्होंने उन्हें 'छुट्टभैया' नेता तक बताया और आरोप लगाया कि वह असदुद्दीन ओवैसी और पश्चिम बंगाल के नेता हुमायूं कबीर की राजनीति की राह पर आगे बढ़ रहे हैं।
ऐसे बयानों से साफ है कि सीट शेयरिंग की बातचीत केवल बंद कमरे की राजनीतिक चर्चा नहीं रह गई है, बल्कि उसके संकेत सार्वजनिक मंचों पर भी दिखाई देने लगे हैं।
सहारनपुर में आमने-सामने आए कांग्रेस-सपा नेता
दोनों दलों के बीच तनाव का एक और उदाहरण 19 अगस्त को सहारनपुर की DISHA बैठक में देखने को मिला। बैठक के दौरान कांग्रेस सांसद इमरान मसूद और सपा विधायक आशु मलिक के बीच सार्वजनिक तौर पर तीखी बहस हुई।
मामला 'UP के लड़के' और 'UP के लड़ाके' जैसे नारों से जुड़ा था, लेकिन राजनीतिक तौर पर इसे दोनों दलों के बीच बढ़ती प्रतिस्पर्धा के संकेत के रूप में देखा गया।
सवाल सिर्फ बयानबाजी का नहीं है। चुनावी मैदान में स्थानीय स्तर पर कांग्रेस और सपा के नेता यदि एक-दूसरे के खिलाफ राजनीतिक जमीन तैयार करते हैं, तो इसका असर भविष्य के सीट बंटवारे और संयुक्त चुनाव अभियान पर पड़ सकता है।
असली विवाद कितनी सीटों का है?
सपा-कांग्रेस के बीच सबसे बड़ा मतभेद विधानसभा सीटों की संख्या को लेकर है।
कांग्रेस की ओर से करीब 115 से 120 सीटों पर चुनाव लड़ने की इच्छा जताई जा रही है। दूसरी तरफ सपा कांग्रेस को करीब 70 से 80 सीटों तक सीमित रखना चाहती है।
यानी दोनों दलों की शुरुआती सोच में लगभग 40 से 50 सीटों का अंतर है। यही अंतर गठबंधन की बातचीत को सबसे मुश्किल बना सकता है।
कांग्रेस का तर्क है कि 2024 के लोकसभा चुनाव में गठबंधन के प्रदर्शन और राहुल गांधी की राजनीतिक स्वीकार्यता ने पार्टी की स्थिति मजबूत की है। वहीं सपा अपने 37 लोकसभा सांसदों के प्रदर्शन को अपनी सबसे बड़ी ताकत मानती है।
'बड़े भाई' की भूमिका पर टकराव
गठबंधन के भीतर असली सवाल यह भी है कि 2027 में नेतृत्व किसके हाथ में रहेगा और सीटों के बंटवारे में किस दल को बड़ा हिस्सा मिलेगा।
सपा खुद को उत्तर प्रदेश की मुख्य विपक्षी ताकत मानती है। वहीं कांग्रेस का मानना है कि राष्ट्रीय स्तर पर उसकी भूमिका और राहुल गांधी की लोकप्रियता को देखते हुए उसे विधानसभा चुनाव में पिछली तुलना में ज्यादा सीटें मिलनी चाहिए।
यही वजह है कि दोनों दलों के बीच 'बड़े भाई' की भूमिका को लेकर अप्रत्यक्ष मुकाबला दिखाई दे रहा है।
मुस्लिम वोट बैंक भी बड़ा फैक्टर
उत्तर प्रदेश की राजनीति में मुस्लिम मतदाताओं की भूमिका को देखते हुए यह मुद्दा भी महत्वपूर्ण है। दोनों दल इस वोट बैंक को अपने साथ मजबूती से बनाए रखना चाहते हैं।
इमरान मसूद की ओर से सपा पर मुस्लिम नेताओं को राजनीतिक रूप से किनारे करने के आरोप लगाए गए हैं। दूसरी ओर सपा खेमे की ओर से कांग्रेस नेताओं पर ऐसे बयान देने का आरोप लगाया जाता है, जिनसे विपक्षी वोटों में बिखराव का फायदा बीजेपी को मिल सकता है।
इसलिए सीट शेयरिंग के साथ-साथ दोनों दलों के बीच मुस्लिम वोटों को लेकर भी राजनीतिक प्रतिस्पर्धा बनी हुई है।
अखिलेश का फॉर्मूला—'जीत चाहिए, सीटें नहीं'
सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव लगातार यह संकेत देते रहे हैं कि गठबंधन में केवल सीटों की संख्या महत्वपूर्ण नहीं होगी, बल्कि जीतने की क्षमता को प्राथमिकता दी जाएगी।
सपा का तर्क है कि अधिक सीटें लेकर कमजोर उम्मीदवार उतारने से बेहतर है कि कम सीटों पर मजबूत संगठन और उम्मीदवार के साथ चुनाव लड़ा जाए।
दूसरी तरफ कांग्रेस का मानना है कि उसे सीमित सीटें देकर मजबूत विपक्षी गठबंधन तैयार नहीं किया जा सकता।
क्या चुनाव से पहले सुलझ जाएगा विवाद?
सपा नेता एमएच खान का कहना है कि चुनाव नजदीक आने पर सीटों का बंटवारा तय हो जाएगा। उन्होंने मध्य प्रदेश में हुए सीट बंटवारे के फॉर्मूले का भी उदाहरण दिया।
लेकिन चुनौती यह है कि सीटों पर फैसला जितना देर से होगा, स्थानीय स्तर पर दोनों दलों के संभावित उम्मीदवार उतनी ही तेजी से अपनी-अपनी जमीन मजबूत करने लगेंगे। इससे अंतिम समय में टिकट वितरण के बाद असंतोष और बगावत की संभावना बढ़ सकती है।
गठबंधन के सामने सबसे बड़ी चुनौती
सपा-कांग्रेस के बीच गठबंधन की संभावना अभी बनी हुई है, लेकिन उसके सफल होने के लिए तीन मोर्चों पर सहमति जरूरी होगी—सीट शेयरिंग, नेतृत्व और सार्वजनिक बयानबाजी पर नियंत्रण।
अगर दोनों दल समय रहते सीटों का व्यावहारिक फॉर्मूला तैयार कर लेते हैं, तो बीजेपी के खिलाफ संयुक्त विपक्षी रणनीति को मजबूती मिल सकती है। लेकिन अगर सीटों की खींचतान लंबे समय तक जारी रहती है, तो कार्यकर्ताओं के बीच अविश्वास बढ़ सकता है।
2027 का चुनाव अभी दूर है, लेकिन 2026 के अंत तक सपा और कांग्रेस के रिश्तों की दिशा काफी हद तक साफ हो सकती है। फिलहाल सवाल यही है कि क्या दोनों पार्टियां 'बड़े भाई' बनने की होड़ छोड़कर बीजेपी को चुनौती देने के लिए एक साथ खड़ी हो पाएंगी, या सीटों की लड़ाई ही गठबंधन की सबसे बड़ी कमजोरी बन जाएगी?

