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Rajya Sabha Election: सपा के तीसरा प्रत्याशी नहीं उतारने से क्यों बदला यूपी का सियासी समीकरण?
 

Rajya Sabha Election: सपा के तीसरा प्रत्याशी नहीं उतारने से क्यों बदला यूपी का सियासी समीकरण?

उत्तर प्रदेश की 10 राज्यसभा सीटों के चुनाव को लेकर समाजवादी पार्टी के तीसरा उम्मीदवार नहीं उतारने के फैसले ने राजनीतिक हलकों में चर्चा बढ़ा दी है। प्रो. रामगोपाल यादव और धनराज परिमल नाथवानी को उम्मीदवार बनाए जाने के बाद सपा के तीसरे प्रत्याशी को लेकर लगातार अटकलें लगाई जा रही थीं। माना जा रहा था कि दो उम्मीदवारों के समर्थन के बाद बच रहे वोटों के आधार पर पार्टी तीसरा प्रत्याशी उतार सकती है।
राजनीतिक विश्लेषकों के मुताबिक, अगर सपा तीसरा उम्मीदवार मैदान में उतारती तो राज्यसभा चुनाव का मौजूदा गणित बदल सकता था। ऐसे में भाजपा और सपा, दोनों ही खेमों में विधायकों को अपने पक्ष में करने की कोशिश तेज होती और क्रॉस वोटिंग की संभावना भी बढ़ सकती थी।
तीसरा उम्मीदवार उतारने पर क्या बदल सकता था?
वरिष्ठ पत्रकार योगेश मिश्रा के मुताबिक, सपा के पास तीसरा उम्मीदवार उतारने के कई आधार मौजूद थे। ऐसा होने पर चुनाव में आसानी से चुने जाने वाले उम्मीदवारों के बीच मुकाबला कड़ा हो सकता था। दोनों राजनीतिक खेमे दूसरे दल के विधायकों को अपने पक्ष में लाने की कोशिश करते, जिससे क्रॉस वोटिंग का खतरा बढ़ जाता।
इसका असर केवल राज्यसभा चुनाव तक सीमित नहीं रहता। 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले विधायकों के पाला बदलने या पार्टी के भीतर असंतोष की स्थिति सपा के लिए चुनौती पैदा कर सकती थी। इसी वजह से अखिलेश यादव ने तीसरा उम्मीदवार नहीं उतारने का फैसला किया।
अतिरिक्त वोटों ने बढ़ाई थी तीसरे उम्मीदवार की चर्चा
वरिष्ठ पत्रकार ज्ञानेंद्र शुक्ला के अनुसार, सपा के पास दो उम्मीदवारों को समर्थन देने के बाद कुछ अतिरिक्त वोट बच रहे थे। इसी आधार पर तीसरे उम्मीदवार को मैदान में उतारने की चर्चा शुरू हुई थी। इस मुद्दे पर विधायकों के साथ बैठक भी हुई थी।
अगर सपा तीसरा उम्मीदवार उतारती तो एनडीए खेमे में भी राजनीतिक हलचल बढ़ सकती थी। खासकर गठबंधन के सहयोगी दलों और विधायकों के बीच क्रॉस वोटिंग की आशंका को लेकर रणनीति बदलनी पड़ सकती थी।
तीसरा उम्मीदवार नहीं उतारना भी बना बड़ा राजनीतिक संदेश
सपा के इस फैसले को राजनीतिक रूप से अहम माना जा रहा है। तीसरे उम्मीदवार को लेकर कई दिनों से चल रही चर्चाओं के बीच अंतिम समय में प्रत्याशी नहीं उतारने से एनडीए खेमे के लिए भी स्थिति अलग हो गई।
विश्लेषकों का मानना है कि अगर मुकाबला होता तो दोनों पक्षों को अपने विधायकों को एकजुट रखने के लिए अतिरिक्त प्रयास करने पड़ते। ऐसी स्थिति में किसी भी खेमे में क्रॉस वोटिंग या राजनीतिक खींचतान की संभावना बनी रहती।
राज्यसभा चुनाव में सत्ता पक्ष की स्थिति मजबूत
वरिष्ठ पत्रकारों के मुताबिक, राज्यसभा चुनाव में आमतौर पर सत्ता पक्ष के पास संख्या बल के कारण मजबूत स्थिति रहती है। ऐसे में तीसरा उम्मीदवार उतारने पर मुकाबला दिलचस्प जरूर हो सकता था, लेकिन इसके साथ दोनों प्रमुख दलों के विधायकों में टूट या क्रॉस वोटिंग का जोखिम भी बढ़ता।
इसी राजनीतिक समीकरण को देखते हुए सपा ने तीसरा उम्मीदवार मैदान में नहीं उतारा। अब पार्टी के इस फैसले को 2027 के विधानसभा चुनाव की तैयारियों और संगठन में एकजुटता बनाए रखने की रणनीति से जोड़कर देखा जा रहा है।
 

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